*शहरनामा-
नर्मदापुरम का यह सौभाग्य है कि यहाँ विराजमान धर्माचार्य की चौखट पर राजनेताओं से लेकर मंत्री, शासन-प्रशासन के आला अधिकारी, गणमान्य नागरिक और श्रद्धालु तक मार्गदर्शन लेने पहुँचते हैं। यह केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि उनके सामाजिक प्रभाव और स्वीकार्यता का प्रमाण भी है। लेकिन जहाँ प्रभाव इतना व्यापक हो, वहाँ अपेक्षाएँ भी सामान्य नहीं, असाधारण हो जाती हैं।
क्योंकि जो आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँच सकती है, वह नगर की समस्याओं के समाधान का माध्यम भी बन सकती है।
पहली बार गरबा की मर्यादा को लेकर धर्माचार्य की सोशल मीडिया पर टिप्पणी सामने आई है। यह टिप्पणी किसी को सही या गलत ठहराने से अधिक एक बड़े सवाल को जन्म देती है। जब कोई उत्सव आयोजन से बढ़कर महोत्सव का आकार लेले, उससे पहले उसकी मर्यादा, अनुशासन और सामाजिक प्रभाव पर चर्चा पहले ही होनी चाहिए। समय रहते उठाई गई आवाज सुधार का माध्यम बनती है; देर से उठी आवाज बहस का विषय बन जाती है।
लेकिन अब प्रश्न केवल गरबे का नहीं रहा। सवाल यह भी है कि जब एक आयोजन की मर्यादा पर चिंता व्यक्त की गई है, तो नगर की दूसरी व्यवस्थाओं पर भी ऐसी ही चिंता क्यों न हो?
माँ नर्मदा की निर्मलता, घाटों की स्वच्छता, शहर की गंदगी और सामाजिक बुराइयाँ भी तो उसी धर्मभूमि की चुनौतियाँ हैं, जिसकी संस्कृति और मर्यादा की हम चिंता करते हैं।
यह भी किसी से छिपा नहीं कि कोई सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक आयोजन सहयोग और चंदे के बिना संभव नहीं होता। इसलिए धन की पवित्रता का प्रश्न उठे तो वह किसी एक आयोजन तक सीमित न रहे। पारदर्शिता और नैतिकता की कसौटी सबके लिए समान हो। यह आरोप नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने का सिद्धांत है।
अब तक गरबे पर उठे एक सहज प्रश्न ने नगर की जिम्मेदारियों और व्यवस्थाओं पर व्यापक संवाद की संभावना खोल दी है। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना इस अवसर को खो देना होगा।
जरा सोचिए, जिस धर्माचार्य की चौखट पर व्यवस्था चलाने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि नतमस्तक होते हैं, यदि वे ही नगर की समस्याओं पर समाधान का आग्रह करें, तो क्या प्रशासन के लिए उसे अनसुना करना आसान होगा? जब मार्गदर्शन पाने वाले इतने प्रभावशाली लोग स्वयं उनके समक्ष उपस्थित होते हैं, तब धर्माचार्य की सामाजिक भूमिका केवल उपदेश तक सीमित क्यों रहे?
धर्माचार्य चाहें तो गरबे की मर्यादा पर हुई चर्चा को एक व्यापक जनजागरण में बदल सकते हैं—नर्मदा संरक्षण, स्वच्छता, गौ-सेवा, नशामुक्ति और सामाजिक सदाचार के लिए सामूहिक संकल्प का अवसर बना सकते हैं।
यह किसी की प्रतिष्ठा को चुनौती नहीं, बल्कि उसकी प्रतिष्ठा को जनहित में सार्थक बनाने का अवसर है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि कौन सही और कौन गलत, इस पर बहस हो। आवश्यकता इस बात की है कि जो नगर की व्यवस्था सुधार सकते हैं, वे सुधारें; जो प्रशासन को दिशा दे सकते हैं, वे दिशा दें; और जो समाज को जागृत कर सकते हैं, वे मौन रहने के बजाय सकारात्मक पहल करें।
गरबे की मर्यादा बचाने की आवाज यदि माँ नर्मदा की पीड़ा तक पहुँचे, तो वह विरोध नहीं, धर्म का विस्तार होगा। और यदि धर्माचार्य की एक अपील से अस्त-व्यस्त व्यवस्थाएँ सुधरने लगें, तो नर्मदापुरम के लिए इससे बड़ी मिसाल क्या होगी?**
कभी-कभी एक छोटा-सा सवाल बड़े परिवर्तन का दरवाजा खोल देता है। अब देखना यह है कि इस सवाल को प्रतिष्ठा की दीवार में चुनवा दिया जाता है या जनहित के संवाद का द्वार बना दिया जाता है।
क्योंकि सच्चा नेतृत्व वह नहीं, जिसके सामने लोग केवल सिर झुकाएँ; सच्चा नेतृत्व वह है, जिसके आह्वान पर व्यवस्था भी सिर उठाकर अपनी जिम्मेदारी निभाए।
दासानुदास चेदीराज दास
