प्रेस संघ की अधूरी मीटिंग और काजू शराब बिरयानी का अनकहा सच !
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
यह हमारे नगर का प्रेस संघ है। पहले यह काफी सशक्त और चरित्रवान धुरंधर पत्रकारों के कारण पहचाना जाता था, अब पदलोलुपता के दीवानों के कारण बंट गया है। मुझे याद है वर्ष 1999 के दिसंबर महीने के आखिरी दिनों में इसके गठन की पहली बैठक रेस्ट बहाऊस में हुई थी तब राजेन्द्र प्रसाद मुझे वहॉ लेकर गया था तब मैं साप्ताहिक अखबार हिन्द संतरी का प्रकाशन करता था ओर खुद प्रधान संपादक था। तब मुझे भले लोगों से दो दो बातें करने के बाद भी बुरा नहीं लगा था जो अब लग रहा है। आज माहौल बदला हुआ है और प्रेस संघ की नींव डालने वाले भले लोग पदच्युत होकर अपने घरों में बुरा महसूस कर रहे है लेकिन वे मजबूर है और आज के लोगों से खुद को असहाय बना चुके है। आज के लोग उनके लिये भस्मासुर बन चुके है। पहले प्रेस संगठन के बैठक कक्ष में विभिन्न पत्रिकायें और अखबार बिखरे होते थे पर आज आलम उल्टा है। अब कमरे के फर्श पर सिगरेट के टुकडे फैले होते है। टेबल पर बीयर है, रम है। व्हिस्की है। जिम है। चने की प्लेट होती है। काजू सजे होते है और बिरयानी की महक से लोगों की लारें टपक पड़ती है।
आज प्रेस संघ की बैठक है। थाना प्रभारी ने व्यवस्था अरेंज की है। सभी सदस्यों के सामने गिलास रखे है। वर्फ, सोड़ा,काजू- नमकीन। आमलेट। उबले हुये अण्डे और चने संजोये गये है ताकि अपनी-अपनी चॉइस के हिसाब से एन्जॉय कर सके। आज से पहले ऐसी शानो शौकत की बैठकें नहीं हुई थी और न ही ऐसे शौकीन मिजाज रहते थे। आज लोगों को सब कुछ झकाक लगता है और पहले के लोगों के नीरस जीवन पर उन्हें तरस आता है। पहले के लोग घरों की चार दीवारी में इसका ऑखों देखा हाल सुन-पढकर शर्म से गढ़े है ,परन्तु बुरा भला समझते हुये इस बुराई से पंगा लेने का साहस नहीं कर सके है। गिलासों में व्हिस्की उड़ेली जा रही है। कुछ प्यादे एक दो पैग पीकर गंभीर हो गये है। काजू खाने वाले बिरयानी को झपटना चाहते है परन्तु बीच में ही मिस्टर झपोडे कह उठते है, यार अभी पी भी नहीं और बिरयानी खाकर क्यां पेट भरोगे। मिस्टर सोनानी अपने बेड़ोल शरीर की तोंद पर हाथ फैरते हुये व्हिस्की का आर्डर देते है और खुद बर्फ के छोटे बड़े टुकडे़ अपनी गिलास में डालते है। मिस्टर बड़बोले सिगरेट सुलगाकर धुंए के गहरे कश छोड़ते हुये छल्ले बना रहे है। व्हिस्की भरे गिलासों में बर्फ के टुकड़े के बीच सुनहलापन नजर आता है।उस सुनहलेपन में मिस्टर सागर दूसरा ही दृश्य देख रहे है।
देश प्रदेश में जाने कितनी समस्याएं सिर उठाए खड़ी है। महंगाई चरम पर है, लाखों डिग्री लिए शिक्षित युवक रोजगार की तलाश मे भटक रहे है, इंजीनियर युवकों की संख्या लाखों मे पर सरकार के पास नौकरी की व्यवस्था नहीं। पेट्रोल डीजल के भाव आसमान छू रहे है, खाने की सब्जी भाजी ओर अनाज लोगों की खरीद से बाहर होता जा रहा है। केमिकल का दूध, दही, पनीर, मक्खन घी के कारखाने चल रहे है सब्जियों और अनाज में किसान जहरीली खाद खिला रहा है लोग बीमार हो रहे है, मर रहे है । सरकारे खामोश है, विपक्ष लाचार है। नैतिक पतन की इंतहा हो गयी और रोज मासूम बच्चियों की अस्मिताएं लूटकर उनकी हत्या करने के समाचार किसी के भी दिमाग को झकझोरते नहीं दिखते और ऐसी अमानवीय घटनाएं रोजमर्या के जीवन में जुटती जा रही है। पाक की नापाक हरकतों और आतंकवाद भारत की अस्मिता को लहूलुहान किये हुये है और हमारे देश के सैनिक उनके कुचक्रों को तोड़ते हुये अपने प्राण न्यौछावर करने से पीछे नहीं हटते है। देश में राजनीतिक हलचले तेज चल रही है और सत्ता पाने की होड़ में नेताओं का चाल, चरित्र और ईमान ढूंढे नहीं मिलता । कल जिनके कंधे सागौन के गुल्लें लेकर पुलिस को देख गलियों में सरपट दौड़ कर चकमा देते थे, जिन्होंने हरे भरे जंगलों को विनाश कर दिया, वे सभी देखते देखते सफेदपोश जेंटलमेन हो गये। जिनकी कच्ची शराब भटटी से जाने कितनी जाने गयी वे सत्ताधारी के करीब होने से नगर के लब्ध प्रतिष्ठित सेठ हो गये।
चोर उचक्के साहूकार बनते गये और उनका दबदबा ऐसा छाया कि वे 10 प्रतिशत से जुये खिलाने पर कर्ज दिलाकर अनेकों लोगों के मकानों दुकानों का दाव लगाकर वे शहर के अधिकांश मकानों के मालिक हो गये। जिनके मकान इन सफेदपोश साहूकारों ने कब्जाया वे आत्महत्या कर मौत को गले लगाते गये, कई तो शहर छोडकर भाग गये। । यहाँ जनता की सेवा के लिये कोई नेता आया नहीं जो भी आया, अपने काले कारनामों को छिपाने के लिये, अपनी संपत्ति बनाने के लिये आया। शहर आजादी के बाद से जैसा था वैसा ही रहा बस एक बदलाव आया कि ओव्हर ब्रिज बन गया और गरीबों की जमीनों पर पैसे वाले सेठ और उनके चहेते कालोनियॉ काटकर अपनी तिजोरी भरते रहे,जिसे ही यह नेता विकास की बातें कहते रहे और सभी जान समझ चुके है कि यह विकास काजी है। नर्मदा घाट स्थित सेठानी घाट का हनुमान मंदिर हो या अन्य मंदिर, इन मंदिरों की जमीनों पर पुजारियों ने बाहर से अपने रिश्तेदारों को बुलाकर बिठा दिया, देखते देखते शहर के कई मंदिरों की बेशकीमती जमीनों पर कालोनी कट गयी, प्लाट बिक गये, कलेक्टर अध्यक्ष रहते मौन रहे, शहर की इन जमीनों का पैसा पुजारियों ने दूसरे शहरों में जमीन खरीदने में लगाया, पर जिन समाज के लोगों ने मंदिर के लिये जमीनें दी वे आज तक उन मंदिरों में सरवराकार नहीं बन सके, जिसमें कभी उनके पूर्वज हुआ करते थे, जिन्हें छलपूर्वक मंदिर के पुजारियों ने तथाकथित संत-महंतों ने हटाकर खुद को सरवराकार बनाकर इन बेशकीमती जमीनों को हथिया लिया है। नेता जनता को बड़े बड़े झूठ को खूबसूरती से बोलकर बरगलाने में सफल होता दिखता है। शहर के अधिकांश मोहल्लों में पानी का संकट है, नालियां नहीं है, सडके नहीं,,शौचालय नहीं है, प्रधानमंत्री आवास में हितग्राहियों को मोटी रकम चढ़ोत्तरी में देने के बाद चप्पले घिसा कर लाभ मिलता है, पर जैसे देश सोया है, वैसे ही मीडिया सो गया है।
हमारे प्रेस संघ के सदस्यों को महापुरुषों की जयंती मनाने में प्रतिस्पर्धा करने में मजा आता है ,कुछेक को छोड कर बाकी सभी का सच यही व्हिस्की है, रम का सुनहरा रंग सच है। काजू बिरयानी सच है। नमकीन सच है लेकिन सब कुछ जानते हुये पूरा प्रशासन चापलूसी के किरदारों के आसपास घूमता आ रहा है। पर अपनी अपनी राजनीति चलती रहे, अपने अपने कारोबार सलामत रहे, अपना कारोबार दोड़ता रहे इसलिए अधिकांश ने अपने जमीर को गिरवी रखकर शहर की बड़ी बड़ी कालोनियों में ऊंचे ऊंचे आशियाने बना लिये। प्रेस का आकर्षण ही ऐसा है कि कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों के बेटे अपने बाप की जीवन भर की सेवा पर ऊंगली न उठे इसलिये, कुछेक जिम्मेदार अधिकारियों के बेटे उनके भ्रष्ट कारनामों की चर्चा न छपे इसलिये, कुछ नेताओं के करीबी तो कुछ पार्टी के जिम्मे्दार पदाधिकारी भी प्रेस की नौका पर सवार होकर वैतरणी पार करने आ धमकें है। कुछ को जिनकी चादरें दागदार है, कोई कीचड़ न उछाले ऐसे कुछ नाकदार व्यूंरो चीफ, स्ट्रंगर,इलेक्ट्रानिक चैनलों के प्रतिनिधि बनकर, अखबारों में जिन्हें लिखना नहीं आता दूसरों की रिपोर्ट- प्रेस नोट छप जाने पर झट अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर शेयर कर खुद रिलेक्स और हैप्पी महसूस करते है।
सिक जोक्स। बियर की बोतलें, जिनका स्माल पैग, रम का लार्ज पैग, तले मसाले वाले चने। वे नौजवान है अपनी थकान मिटा रहे है। उनमें बातें होती है चारों और फैले भ्रष्टाचार की। कुछ सूचना के अधिकार के तहत सच्चाई बाहर लाते है पर सच जनता तक न पहुंचे इसकी मुंहमांगी कीमत मिलते ही, भ्रष्टाचार का सच दब जाता है। रक्षक सितम ढा रहे है और कानून व्यवस्था पूरी तरह अपराधियों व राजनेताओं की मुटठी में कठपुतली बन नाच रही है। गरीब बेहाल है। आफिसों में जनता के काम नहीं होते ,सभी ओर दलाल ही दलाल है ,पैसे खाये बिना बाबू फाईल नहीं सरकाता है। पुलिस चोर साथ बैठकर रमी खेलते है। शराब माफिया गुंडों की फौज गली कूचों में आतंक मचाये है परन्तु किसी की हिम्मत नहीं की उनकी खबरें छाप सके ।
हिम्मत उनमें है जो ईमानदार है। जो समाज और देश के प्रति अपने फर्ज को समझता है ऐसे बिरले ही लोग रह गये है। अच्छे और न बिकने वाले लोगों पर झूठे प्रकरण लादकर उन्हें लिखने से रोका जाता है। सरकार का पूरा तंत्र इसमें लग जाता है परन्तु प्रेस संगठनों में ऊंचे पदों पर आसीन रहकर ऊंचे लोग कभी इनके विषय मे सोचते तक नहीं, वे इन्हें अछूत समझते है। मजे में वे होते है जो सुबह शाम थाने की ड्योढ़ी पर हाजिर रहकर थानेदार के लिए मुखबिरी करता है और ऐसे लोग माल सूत कर अपना सीना फुलायें घूमते है जबकि ऐसे घिनौने लोगों का दर्जा पूरे समाज में अछूत जैसा हो जाता है, पर लोक मर्यादा के रहते सभी जुबान बंद कर बैठ जाते है।
बात पत्रकार संघ की मीटिंग की चल रही थी जिसमें सोनानी पास आकर बैठ गया और अपने बदसूरत होठों पर सिगरेट सुलगा कर बोला। यार एक एडवाईज दो। सागर उसका चेहरा देखने लगता है। सोनानी नीट लेता है। एक घूंट भरते हुये वह कहता है आजकल अवैध शराब कारोबार थोड़ा मंदा चल रहा है, नए लड़के गलियों मोहल्लों के लिए मिलते नहीं, नए पुलिस अधिकारियों ओर आबकारी वालों से ट्यूनिंग नही बैठ पाने से रिक्स है ओर पूरे जीवन कमाई इज्जत का कोई भी फ़ालूदा बना सकता है, इसलिए क्यो न इसे बंद कर नया कारोबार शुरू करे? सागर ने हुंका भरा हूँ तो तुरंत सोनानी बोला क्यों न मैं पानी के इंजेक्शन बनाना शुरू कर दॅू। इसमें कोई लागत भी नहीं और मुनाफा ही मुनाफा और पानी से कोई मरेगा भी नहीं तब जिले में अपने धंधे वाले सब अपनी मुट्ठी में होंगे। सागर ने आश्चर्य से फुसफुसाते हुये कहा धीरे बोलों कोई सुन लेगा। सोनानी ने कहा- यहॉ मुझे और तुझे छोडक़र सब लुढक़ गये है तब सुनने वाली बात ही नहीं। विश्वरैया बुदबुदाते उठता है और कहता है मैंने कोई बात नहीं सुनी। पर बिना मॉगे सलाह देता हॅू कि इंडिपेंडेंट करों तो ठीक है पर इसकी चर्चा दोबारा नहीं करना। सोनानी इंडिपेंडेंट शब्द सुनकर खुश होता है और कहता है कि मैंने अपने कालम में लिखकर कई इंडिपेंडेंट नेता बनाये है इसलिये यह काम इंडिपेंडेंट ही करूगा।
विश्वरैया खुद अखबार का संपादक बनने की बात करता है तब सागर कहता है अभी तुझे लिखना तक नहीं आता फिर संपादक की बात तो दूर तुझे कोई पत्रकार तक नहीं बनायेगा। विश्वरैया कहता है अपना निखट्टू कप्तान किस दिन काम आवेगा। पत्रकारिता में डिप्लोमा लेकर एल.एल.एम. करके बेरोजगार घूम रहा है उसी से सब करवा लेंगे। -क्या बतलाऊ यार। वह इतना बेवकूफ नहीं जो हम अनपढ़ों के लिए अपना लिटरेचर लुटाये। आज के लिटरेचर में जब तक राजनीति की कुटिलता नहीं आयेगी तब तक तुम्हें लोग लेखक क्या लेखक का बाल तक नहीं समझेंगे। वह जमाना लद गया जब लेखक, कल्चर और हिस्ट्री की कहानी और कविता बनाकर युग निर्माता बन जाता था। अब तो मीटिंग-सीटिंग का जमाना है और यहाँ वहाँ तॉक-झॉक कर रिपोर्ट बनाकर कीचड़ उछालने वालों आईमीन कलई खोलने वालों का जमाना है और वे लोग ही सफल है।
निखट्टू रामबल पीता नहीं था पर उसकी सब मानते थे, बैठक के पूर्व पत्रकारों ने हँगामा कर सारे कमरे ओर हाल के खिड़की दरवाजे के काँच तोड़ दिये थे जिनकी कोई फोटो न ले इस बात का थानेदार ने पुलिसवालों को कह दिया था जो सादी बर्डी मे व्यवस्था ओर इंतजाम को देख रहे थे। निखट्टू बोला क्या बात कर रहे हो तुम लोग। अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा काम करके उनको बढ़ावा दे रहे हो जो हमारी आज की बैठक की पोल खोलने के लिये तैयार बैठा होगा। ऐसी ईमानदारी की पत्रकारिता करने वालों के विरूद्घ राष्ट्रद्रोह का प्रकरण बनवाने के लिए हमें एकजुट होना चाहिये।
बैठक अरेंज करने वाला थानेदार अपने डील-ढ़ौल शरीर को गाड़ी में लादे आ टपकता है और बात सुनकर समझकर कहता है। जिस तंत्री की बात तुम कर रहे हो उसके विषय में मुझे मालूम हुआ है कि वह यहॉ की राजनीति का अथारिटी है। उसके पास यहॉ के हर नेता और अधिकारी की जन्मपत्री है। किस नेता ने कैसे जागीर बनाई? किस नेता अधिकारी के गुण्डों से संबंध है और कौन पुलिस वाला दलाली खा रहा है। किस छुट-भैईया नेता के कैसे गलत धंधे चल रहे है। कौन कार्यकर्ता किस अधिकारी से हफ्ता उगाहता है? कौन सा सामाजिक कार्यकर्ता कौन से मंत्री का सप्लायर है? किस पुलिस इंस्पेक्टर का घर विदेशी माल से भरा है उसे पता है। उसे वे रास्ते भी मालूम है जिन पर चलकर वह पलक झपकते ही लखपति बन सकता है। लेकिन इतना जानने के बाद भी वह खुद अभी तक फटीचर का फटीचर है। हालांकि सब उसकी प्रतिभा का लोहा मानते है पर उससे कतराते है, वह मुहफट है, किसी से दबता नहीं।
एक कोने में सजी टेबल पर सागर को गहरी सोच में डूबा देख धर्मा ने झकझोरा, बोला यार तुमने खाना खा लिया क्या। उसने न में सिर हिलाया। धर्मा बोला मैंने तो खा लिया और मैं चलता हूं और वह अपनी साइकिल की ओर बढ़ा, पता नहीं क्यों सागर को भी यह सब रास नहीं आ रहा था और वह भी अपनी स्कूटर की ओर बढ़ा तभी व्हिस्की शराब में खोये खाना खा रहे चाचा ने आवाज लगाई, अरे बिना खाये क्यों जाते हो, थोडा कुछ ले लो। तब वहाँ का नजारा अलग था जो कुछ समय पहले घर से आये थे, जो देश की, समाज की सोच के पैरोकार थे, उनका फर्ज और ईमान खिड़कियों, दरवाजों के शीशे को बीयर की बोतले फेंक कर तोड़ चुका था। जो कह रहे थे कि उनके काम धंन्धे पर चोट न पहुंचे,उनके हित उनके कारोबार का संरक्षण मिले,वे अब एक दूसरे की कमियां बता रहे थे, कौन किसके तलवे चाटता है, कौन पर किसका हाथ है, कौन घिनौने खेल में लगा है यह सब बातें उन व्हिस्की, रम के पैगों से हजम नहीं हो पा रही थी और लोग एक दूसरे को नंगा करने में जुट गये।
कुछ हाथापाई पर उतर आये, बैठक रूम में दरवाजे और खिड़कियों के कांच ही कांच थे और यह शहनशाही व्यवस्था जुटाने वाले नगर कोतवाल के कर्मचारी कमरे में कांच समेट रहे थे, खाने की प्लेट फेंकने से फर्श पर बिखरे खाने को झाडू से साफ कर रहे थे। नगर कोतवाल एक ओर खड़े यह नजारा देख रहे थे, जिन्हें खुद का होश नहीं था, वे उनके चरण स्पर्श कर घर जाने की बात कहकर निकलते देखे गये। इस बैठक में चर्चा होनी थी जनता पर हो रहे प्रशासनिक शोषण की, दलालों के चल रहे कमीशन की । आखिर यहॉ उपस्थित हुये लोग इन्हें छापते क्यों नहीं, पर जो लोग अपने अखवारों में जिनका मेटर और फोटो छापकर अपने स्वार्थ की स्कीमों से निकलने वाला क्रीम चाटने के आदि रहे हो, आज उनका सच देखने काबिल था। पहली बार ऐसा हुआ कि इसके न तो फोटो खिचे और न ही रिकार्डिग हुई, पर नगर कोतवाल ने दो लोगों के हाथ जोड़कर कहा भैईया इन कमरों में जितने खिड़की- दरवाजे के कांच टूटे है सुबह लग जायेंगे, पर इसकी खबर न आये तो उम्दां बात होगी, पहली बार ऐसा हुआ उन दोनों ने जो सारा सच लाते थे, इस सच से पाठकों को वंचित रखा।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
