–डॉ. शैलेश शुक्ला आज से दस साल पहले फोन का मतलब सिर्फ कॉल और संदेश था, पर आज...
विचार
लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन, जनता के लिए शासन और जनता की भागीदारी वाला...
राजनीति में विपक्ष में बैठकर सत्ता को आईना दिखाना अपेक्षाकृत आसान है। असली परीक्षा तब होती है,...
इस बार 15 अगस्त के लालकिले से प्रधानमंत्री के भाषण और उसकी शब्दावली के स्तर को लेकर...
भक्ति और बैंक बैलेंस…. शहर में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं पहली: “बैलेंस कितना है?”...
नर्मदापुरम में नरक की कोई पट्टिका नहीं लगी है। यहाँ न धुआँ दिखता है, न आग...
देश के ज्वलंत मुद्दे को लेकर- शहरनामा “जंतर-मंतर की हुंकार और सत्ता की लाचारी” आख़िरकार शिक्षा के...
युवाओं को संगठित करने की श्रेयता तो, जस्टिस सूर्यकांत जी के पाले में ही आयेंगी….? एक शब्द,...
शहरनामा दिल्ली में छात्र प्रर्दशन से उठे सवाल.. “आख़िर छात्र जाएँ तो जाएँ कहाँ?” जब किसी राष्ट्र...
हमारे बुज़ुर्ग एक छोटी-सी बात कह जाते थे—”जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो।” उस समय यह...
