डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय अकादमिक जगत में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने शोध, लेखन और शिक्षण के कारण नहीं, बल्कि अपने वैचारिक हस्तक्षेपों और सार्वजनिक बयानों के विवादों के कारण भी लगातार चर्चा में बने रहते हैं। निवेदिता मेनन नाम भी उनमें से एक है। वे देश के प्रगतिशील और वामपंथी बौद्धिक वर्ग का प्रमुख चेहरा हैं। उनके अनेक सार्वजनिक बयान ऐसे हैं जिन्होंने गंभीर विवादों को जन्म दिया और यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या उनकी बौद्धिक प्रतिबद्धता वास्तव में भारतीय समाज और राष्ट्रहित के अनुरूप है या फिर वह एक विशिष्ट वैचारिक एजेंडे तक सीमित है, जिसमें राज्य और राज्य में रहनेवाले नागरिकों का हित समाप्त है, सिर्फ आपस में विवाद पैदा करना ही उसका मुख्य उद्देश्य है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर शिक्षक होने के साथ ही समाज के विचार-निर्माता भी होते हैं। ऐसे में उनके विचारों का मूल्यांकन अकादमिक उपलब्धियों के आधार के साथ उनके सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव के आधार पर भी होना चाहिए।
दरअसल, उनके समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने महिलाओं, लैंगिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर बहसों को आगे बढ़ाया, किंतु यह भी उतना ही सच है कि उनकी बौद्धिक परियोजना अक्सर भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने के बजाय पश्चिमी वामपंथी दृष्टिकोणों से संचालित दिखाई देती है। वह भारतीय समाज को उनके अतीत और वर्तमान के आधार पर स्वाभिमान से भर देने के स्थान पर एक ऐसी सोच में डूबो देना चाहती हैं, जिसमें सिर्फ हताशा, नकारात्मकता एवं स्वयं को कमजोर समझने तथा आपस में लड़वा देने के प्रयास हैं।
कश्मीर पर विचार: असहमति या राष्ट्र-विमुख दृष्टिकोण?
निवेदिता मेनन के सबसे विवादास्पद बयानों में कश्मीर संबंधी टिप्पणियां प्रमुख हैं। 2016 के जेएनयू विवाद के दौरान उनके भाषण को लेकर व्यापक आलोचना हुई है। उन्होंने कश्मीर के प्रश्न पर ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो भारत की संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। क्या किसी विश्वविद्यालय शिक्षक को राष्ट्र-राज्य की नीतियों की आलोचना करने का अधिकार है? निश्चित रूप से है, लेकिन क्या ऐसी आलोचना इस सीमा तक पहुंच सकती है कि वह अलगाववादी नैरेटिव के समान प्रतीत होने लगे?
वस्तुत: मेनन के अनेक वक्तव्य इसी कारण विवादास्पद बने, क्योंकि उन्होंने सिर्फ सरकारी नीतियों की आलोचना नहीं की, वे उन भावनाओं को भी वैधता प्रदान करती हुई प्रतीत हुईं जिन्हें देश का बड़ा वर्ग राष्ट्र-विरोधी मानता है और जो भारत को कमजोर करने की मंशा रखते हैं।
समान नागरिक संहिता पर रुख
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के विरोध में मेनन का रुख भी व्यापक बहस का विषय है। उनका तर्क है कि यूसीसी का राजनीतिक इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है और कानूनी एकरूपता हमेशा न्याय की गारंटी नहीं देती, पर इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वे ये भूल जाती हैं कि देश के जिस भी राज्य में यूसीसी पहले से लागू है, वहां मुसलमान पर आज तक कोई अत्याचार नहीं हुआ है, बल्कि वह वहां उस गोवा राज्य में विकास ही कर रहा है। उसके बाद अन्य राज्य उत्तराखण्ड एवं अन्य में भी यही हाल है।
वास्तव में यदि किसी कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान अधिकार देना है, तो उसका विरोध सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे कौन लागू कर रहा है। महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की कथित अपने नजरिए से ही पैरोकार होने के बावजूद मेनन का यूसीसी-विरोध निश्चित तौर पर विरोधाभासी है। यहां नारीवादी दृष्टिकोण की जगह पहचान-आधारित राजनीति अधिक प्रभावी दिखाई देती है।
भीमा कोरेगांव और नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न
सभी जानते हैं कि भीमा कोरेगांव मामले के आरोपियों के समर्थन में मेनन का सार्वजनिक रुख भी विवादों में रहा है। उन्होंने उन लोगों के पक्ष में आवाज उठाई, जिन्होंने जांच एजेंसियों की कार्रवाई और सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। वस्तुत: ऐसे मामलों में चयनात्मक सक्रियता दिखाई देती है। क्या मानवाधिकारों की चिंता कुछ विशेष वैचारिक समूहों तक ही सीमित रहनी चाहिए? लेकिन मेनन यहां गलत के साथ खड़ी हुई हैं!
सेना और राष्ट्र भाव पर विवाद
भारतीय सेना से जुड़े उनके वक्तव्यों को लेकर भी समय-समय पर विवाद होता रहा है। यहां मूल प्रश्न राष्ट्र के प्रति समर्पित हो जाने की अवधारणा का है। भारत में सेना राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। ऐसे में जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी सेना से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर बोलता है, तो उसके शब्दों की व्याख्या सिर्फ अकादमिक संदर्भ में नहीं होती। मेनन अक्सर ऐसी भाषा का प्रयोग करती हैं जो अनावश्यक विवादों को जन्म देती है। वह सेना को ही टार्गेट करती हुई कई बार दिखाई दी हैं।
गाजा, वैश्विक राजनीति और वैचारिक प्राथमिकताएं
फिलिस्तीन के समर्थन में आयोजित कार्यक्रम में उनका कथन, “गाजा हमें बचाएगा” भी चर्चा का विषय बना, लेकिन उनसे जब पूछा जाता है कि क्या भारतीय विश्वविद्यालयों के बुद्धिजीवियों की प्राथमिकता भारतीय समाज की चुनौतियां होनी चाहिए या वैश्विक वैचारिक संघर्ष? तब वह कोई भी सार्थक जवाब नहीं दे पाईं। वे ऐसे पूछे गए प्रतिप्रश्न पर कभी भी सार्थक संवाद नहीं करतीं।
ऐसे में निवेदिता मेनन के लिए आज कहना यही होगा कि उनके कई विचार और बयान भारतीय समाज के बड़े वर्ग को असहज करते हैं। वे अपने ही राष्ट्र, संस्कृति और परंपरा के प्रश्नों पर अत्यधिक संशयवादी नजर आती हैं। वस्तुत: जो साक्ष्य उनके बारे में आज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं, उन्हें देखकर और समझकर भी क्या उन्हें इस बात का हकदार माना जा सकता है कि वे सच में वैचारिक सम्मान पाने का हक रखती हैं? और यदि नहीं रखती, तब फिर हम क्यों उनकी सार्वजनिक मंचों पर बाते कर रहे हैं?
वास्तव में उनका हालिया हिन्दू मर्दों की मर्दांगनी पर किया गया आरफा खानम के साथ कटाक्ष हो या हिन्दू लड़कियों को कथित मुसलमान लड़के पंसद क्यों आते हैं? कहना हो! इसका यदि आज सबसे अच्छा उत्तर हो सकता है तो वह यह है कि हिन्दू अपने बारे में विचार करें, आखिर यह उनके लिए क्यों कहा जा रहा है? ऐसे में उसे क्या करना चाहिए, यह संकेत तो “मेनन” दे ही रही हैं, क्यों न उसी पर चला जाए!
