शहरनामा
दिल्ली में छात्र प्रर्दशन से उठे सवाल..
“आख़िर छात्र जाएँ तो जाएँ कहाँ?”
जब किसी राष्ट्र का युवा अपने भविष्य को लेकर सड़क पर उतरने को विवश हो जाए, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं होता, बल्कि व्यवस्था से पूछा गया सबसे कठिन प्रश्न होता है।
प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी सरकार सत्ता में है। प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था उस युवा की आवाज़ सुन पा रही है, जिसके कंधों पर कल का भारत खड़ा होना है?
आज अनेक छात्रों के मन में एक पीड़ा दिखाई देती है। उन्हें लगता है कि उनकी बातें निर्णय लेने वालों तक पूरी तरह नहीं पहुँच रहीं। ऐसे में उनके मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है—
यदि विधायिका हमारी बात नहीं सुन रही, कार्यपालिका हमारी माँगों को स्वीकार नहीं कर रही, न्यायपालिका तक पहुँचने में लंबा समय लग रहा है और मीडिया भी हमारी समस्या को पर्याप्त स्थान नहीं दे रहा, तो हम जाएँ तो जाएँ कहाँ?
यह प्रश्न किसी एक संगठन, एक दल या एक आंदोलन का नहीं है। यह उस पीढ़ी का प्रश्न है जो वर्षों तक पढ़ाई करती है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती है, परिवार की उम्मीदों का भार उठाती है और फिर अनिश्चितता के बीच अपने भविष्य का इंतज़ार करती है।
युवा किसी सरकार से उपकार नहीं माँगता। वह केवल यह चाहता है कि नियम स्पष्ट हों, प्रक्रियाएँ निष्पक्ष हों, परीक्षाएँ समय पर हों, परिणाम भरोसेमंद हों और उसकी मेहनत का सम्मान हो।
लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव नहीं हैं। उसकी असली ताकत यह है कि सबसे कमजोर और सबसे साधारण नागरिक भी अपनी बात कह सके और उसे यह भरोसा रहे कि कोई न कोई संस्था उसकी बात सुनेगी।
सरकार का भी अपना पक्ष होता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसका दायित्व है। न्यायपालिका पर मामलों का भारी बोझ है। मीडिया के सामने भी अपनी प्राथमिकताएँ और चुनौतियाँ हैं। लेकिन इन सबके बीच यदि छात्र यह महसूस करने लगे कि उसकी आवाज़ कहीं खो रही है, तो यह चिंता केवल छात्रों की नहीं, पूरे लोकतंत्र की होनी चाहिए।
याद रखिए, निराश युवा किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं होता। जिस देश का युवा आशा खो देता है, वह देश अपनी सबसे बड़ी शक्ति खोने लगता है।
छात्रों को भी यह समझना होगा कि उनका संघर्ष संवैधानिक, शांतिपूर्ण और तथ्य आधारित हो। क्योंकि नैतिक बल वही आंदोलन प्राप्त करता है जो संयम और संवाद का रास्ता नहीं छोड़ता।
और सत्ता को भी यह समझना होगा कि युवा केवल आज का मतदाता नहीं, कल का शिक्षक, वैज्ञानिक, सैनिक, न्यायाधीश, प्रशासक और जनप्रतिनिधि है। उसकी आवाज़ को सुनना राजनीतिक आवश्यकता नहीं, राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
शहरनामा का मानना है—
राष्ट्र का भविष्य संसद भवनों में नहीं, कक्षाओं में तैयार होता है। यदि कक्षाओं में बैठा छात्र निराश हो गया, तो संसद की बहसें भी भविष्य नहीं बदल पाएँगी।
इसलिए प्रश्न किसी सरकार से नहीं, पूरे तंत्र से है—
क्या हम अपने युवाओं को इतना विश्वास दिला पा रहे हैं कि उनकी मेहनत, उनकी प्रतिभा और उनकी आवाज़ का सम्मान होगा?
क्योंकि…
जिस देश में छात्र उम्मीद छोड़ देता है, वहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं हारता—वहाँ आने वाला भविष्य हारने लगता है।
