चीख पुकार है,आह और रुदन क्रंदन है,
बोलो मोदीजी !, क्या यही नारी वंदन है ?
कपड़ों को फाड़कर सड़क पर घसीटना,
निर्ममता से “जानवरों की तरह” पीटना,
आँसू गैस छोड़ना व “तेज पानी छींटना”,
चाहे जो करो, ठान लिया मरना मिटना,
हक मांगने पर लाठियों से अभिनंदन है।
बोलो मोदीजी !, क्या यही नारी वंदन है ?
गालियां देकर के छाती में मारे कई घूंसे,
सिर फोड़े और पीठ की तरफ डण्डे ठूंसे,
बहुत सारा खून बहा ज़ख्मी हुवे बाजू से,
क्यों प्यास बुझाते हो बच्चियों के लहू से,
निहत्थों को मारने, “थमाई मशीनगन है”।
बोलो मोदीजी !, क्या यही नारी वंदन है ?
पढ़ाने के लिये बर्तन माँजे बोझा ढोया है,
पेपरलीक से उनका दिल कितना रोया है,
इस तनाव ने 21 नौनिहालों को खोया है,
तुम्हारा ज़मीर मर गया, या फिर सोया है,
बेशर्मी से हंसते हो, ये कोई मनोरंजन है।
बोलो मोदीजी !, क्या यही नारी वंदन है ?
दिल मे तुम्हारे जरा भी दया के भाव नही,
आंखें है पर दिखे तुमको उनके घाव नही,
कई बोतल खून बहा,मामूली रिसाव नही,
जनरल डायर – सा, ये अच्छा बर्ताव नही,
प्रोटेस्ट को कुचलने पर चिंतन, मंथन है।
बोलो मोदीजी !, क्या यही नारी वंदन है ?
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कवि पोरवाल मुकेश निडर, मंदसौर मप्र
