
आज दुनिया में सभी माँ बाप अपने बच्चों को पढ़ाई के दरम्यान जिस कक्षा में वह अध्ययनरत है उस परीक्षा में 100 प्रतिशत अंक लाने का सपना देखते है, जिसमें बच्चे पढ़ाई के दबाव में न तो ठीक से सो पाते है और न ही जीवन में खेल आदि व्यायाम के प्रदर्शन से वंचित होने से खुद को कमजोर और मानसिक दबाव में पाते है, यह बच्चों के भविष्य के साथ क्रूरतम मजाक है जिसे बंद किये जाने की बजे सभी प्रोत्साहित कर रहे है। बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती है, बशर्ते उन्हें तराशने की आवश्यकता है कि किस बच्चे में कौन सी प्रतिभा का अंकुरण उसे पूर्णता प्रदान कर सकता है। हर बच्चे से माँ बाप की अपेक्षा होती है की वह जिस विषय का छात्र है उस विषय में वह शतप्रतिशत परिणाम लेकर आये, कुछेक बच्चे इस दबाव के झेल कर अपेक्षा पर खरे उतरते है किन्तु अधिकांश असफल होने या प्रतिशत कम होने पर तनावग्रस्त हो जाते है, यही तनाव बच्चे के पुरे जीवन की दिशा और दशा बदल सकता है, यह माँ बाप और समाज को सोचना होगा ताकि घर परिवार के बिना बजह मिलने वालें उलाहने और अवसाद के रहते बालक में कही अपराधबोध तो प्रवेश नहीं कर गया है जो आगे चलकर उसे अपराध की दुनिया का सरताज बना दे। बच्चो की प्रतिभा को गढ़िये न की अपनी मर्जी से उन्हें विषय लेकर पढ़ने को विवश कीजिये, वह जो बनना चाहता है उसे बनने दीजिये अगर नही बन सका तो आप बच्चे के साथ अन्याय के खुद दोषी होंगे। असफलता पर दिए गए ताने बच्चो को उल्लू की उडान से न भर दे और आप अपने बच्चे को उल्लू कहते रहे और वह सच में उल्लू बनकर दुनिया को उल्लू बनाने में माहिर हो जाए तो इससे क्या माँ बाप का नाम रोशन होगा? यह समझने की आवश्यकता है।
जरूरी नहीं है की एक सामान्य व्यक्ति या मजदूर का बच्चा अंग्रेजी गणित या अन्य विषय में कमजोर होने से मुह फेर ले, देखा गया है शिक्षकों, शिक्षाविदों के बच्चे भी इन विषयों से मुह फेरने की प्रतिभा में सबसे आगे निकल जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। मैं किसी और की क्यों अपनी ही बात ले लूँ तो कक्षा पांचवी में स्कूल में अव्वल 78 प्रतिशत लेकर पास हुआ किन्तु छटवी कक्षा में अंग्रेजी चंडालनी बनकर आई और सुसरी के 26 अक्षरों की गिपड-सिपड ने भेजा सुजा दिया। अंग्रेजों की इस डायन माता अंग्रेजी में चरित्र पर दाग लगा दिया और सप्लीमेंट के बाद भी पास नहीं हो सका। जैसे तैसे चिमनी-लालटेन की सुविधा मिली तब रात्रिकालीन पठाई कर आठवी पास कर नौवी में प्रवेश चाहा तो कोई मैथ लेने की जिद किये था तो कोई साइंस पर अटका था, वह अच्छा रहा की प्रतिशत ही कम थे तो किसी का वश नही चला और कामर्स मिल गया। चुनौती अब शुरू हुई जब अर्थशास्त्र, बुककीपिंग, वाणिज्य जैसे विषय के नाम नही सुने थे वे किसी नई नवेली दुल्हन की भाँती थमा दिए गए। मैं पुरे मनोयोग से मन लगाकर इन्हें पढ़ने लगा की अर्थशास्त्र मुझसे रूठी हुई दुल्हिन के तरह मुंह फेर गया, तीन विषय में सप्लीमेंटी के बाद इन विषयों के ज्ञान से मेरा मस्तिष्क बिलकुल कोरा था परीक्षा दी फेल हो गया। पांचवी कक्षा का टापर में नौवी में उल्लू जैसा हो गया जिसकी उडान तो आसमान छूने की थी किन्तु प्रतिभा सर्वथो-सुखी नहीं थी। पढ़ाई छोड़ने का मन करता पर पिताजी के उलाहने और डंडे से होने वाली पिटाई स्कूल को कैदखाना समझ रोके रखती। नौवी में दुसरे साल पर्चा पढ़ने के पहले मैंने त्रिकुटी में ध्यान लगाकर ईश्वर से प्रार्थना की कि-‘हे प्रभो ! आनन्ददाता ज्ञान मुझको दीजिये‘-कि मैं कम से कम पासिंग मार्क के पांच सवाल तो ठीक कर सकूँ, और नहीं तो-‘शीघ्र सारे परीक्षकों को दूर मुझसे कीजिये‘-ताकि मैं आसानी से अपने साथ लाई नक़ल की शरण ले कापी में उतार सकूँ ।
हाय रे मेरी किस्मत मैंने परीक्षा में मिले पेपर को इत्मीनान से एक-एक शब्द को पूरा पढ़ा, दिमाग घूम गया दिन में तारे नजर आने लगे। मैंने पर्चे को दूसरी बार फिर पढ़ा इसके बाद मैं पर्चे को कई बार पढ़ गया। मैं आधे घंटे तक पेपर को बार बार पढ़ता, आसमान देखता, सामने परीक्षा दे रहे मित्र के बालों में लगे तेल और रेंग रहे जुए का चिंतन करता तो कभी मुझ जैसी स्थिति के दौर से गुजरने वाले छात्रों को परीक्षा हाल में तलाशता, कुछ सिर खुजाते दीखते तो सोचता अरे फला टेबल वाले जैसे अपने हाल है, किन्तु अनेक लोग कापियों में लिखते दिखते, तो कोई पेन को मुंह में दिए सियाही में होटों का रंगा देखता सभी पेपर हल करने की रश्मों को पूरा करते दिखते। मैंने कलम को टेबिल पर रख हाथ पर हाथ रखकर बैठ गया। नर्मदा मैया काली हनुमान जी जितने भी मंदिर मोहल्ले में है उन सभी देवी देवताओं के गुणगान किये किन्तु किसी भी पेपर के प्रश्नों का हल नही सुझाया तब आखिर में हनुमान चालीसा कर चुकने के बाद भी सवाल के जबाव नहीं सूझे तब अर्थशास्त्र बुककीपिंग जैसे विषय देने वाले लेखकों को तमाम गालिया देने का मन हुआ किन्तु इससे पेपर थोड़ी हल होता? गले में गंडे ताबीज थे, चबूतरे की भभूत थी कोई काम नहीं आ रही थी, कम्बख्त पर्चे का एक सवाल भी मेरे लिए नहीं बनाया गया है। जैसे तैसे हिम्मत कर बाथरूम की इजाजत मिली जितनी नक़ल गाइड से फाड़कर ले गया वह भी देख डाली किन्तु एक भी नक़ल का सवाल नहीं आया था। काफी कोरी छोडू तो नंबर गोल मिलने है, गलत करूँ तो भी मटियामेट होना है, दोनों ही स्थिति में गले में फांसी लगी है तो फ़ासी से बचने के लिए हासी सूझी और तुरंत पेपर हल करने के लिए बाकायदा दस प्रश्नों में पांच को हल कीजिये की आपूर्ति हेतु मैंने हिम्मत जुटाई रामायण महाभारत के प्रसंगों सहित पिछले सप्ताह देखी फिल्म नागचम्पा की कहानी घसीटा अक्षरों में लिख दी ताकि कापी जांचकर्ता भी न पढ़ सके और न समझ सके।
‘जब तक साँस है तब तक आस है‘ इस उम्मीद से निरुपाय से उबर सका, भले मूर्खता कर अपने को परीक्षा के संकटापन्न अवस्था मैंने अपनी बुद्धि का लोचा किया हो किन्तु जब अच्छे-अच्छे बुद्धिमानों की बुद्धि भी मोच खा जाती है, तो मेरी क्या बिसात? मैंने कापी जमा करने से पहले काफी जांचने वाले परीक्षक के नाम से एक चिट्ठी भी छोड़ी ताकि अगर वे मेरी दृष्टता से नाराज हो जाए तो भी वे मुझे फेल करने वाले है, और वैसे भी फ़ैल होना मेरा परीक्षासिद्ध अधिकार बन गया था। मैंने आत्मीय पत्र परीक्षक के नाम लिखा-मेरी नैया मझदार में डूब रही है,आप खिवैया हो। मेरे परीक्षा परिणामों से मेरे घर पर मेरी कोई इज्जत नहीं करता है, पिताजी ने कह दिया है इस साल फ़ैल हुए तो पुरे मोहल्ले के जानवर गाय भैस चराने लगा दूंगा और घास के काटने का काम भी दिला दूंगा। यहाँ तक तो कष्ट उठा लूँगा किन्तु उन्होंने धमकी दी है किसी चरवाहे की लड़की से शादी कर दूंगा, अगर शादी हो गई तो पढ़ाई छूट जाएगी, मुझे कैसे भी करके हाई स्कूलवोर्ड की परीक्षा पास करनी है ताकि इन झंझटों से बच सकूँ. मेरे तिवारी सर, गोयल सर और ठाकुर सर को दया आ गई और उन्होंने मुझे सप्लीमेंट्री देकर परीक्षा कीतैयारी कराइ और हाईस्कुल बोर्ड तक इतना सक्षम किया की नक़ल का ख्याल मेरे जेहन में नहीं आया।
आर्य सर ,गोयल सर और सिंह सर स्टापरूम में बैठे हुए थे मैं पंहुचा और उन्हें देखते ही उलटे पाँव लौटने को हुआ तो उन्होंने मुझे बुलाया ओर कहा कहा खिसक रहे हो, क्या पिताजी ने ढोर चराने की व्यवस्था कर दी है ..या दूध बेचने का काम सौपं दिया है, सच मानिये उस समय में दूध बेचा करता था जिसे एक सुबह वाकिंग को निकले गोयल सर ने देख लिया था, मैंने प्रश्न सुनकर उनकी और देखा, उन्होंने अन्य सरों को कहा बच्चे के साथ हसी ठिठोली करना ठीक नही। ठाकुर सर ने कहा यह उल्लू की उडान भरने चला था और परीक्षा कापी में चिठ्टी रखकर परीक्षक की ज्ञानेन्द्रिय को जगाकर फिल्म की स्टोरी पर परीक्षक का दिल जीत नंबर बटोर ले तो क्या परीक्षक को उल्लू कहोगे, या परीक्षक को उल्ल्लू बनाने वाले को उल्लू कहोगे? सिंह सर बोले या तो यह बच्चा सीखने की कोशिश कर उसे मिले उल्लू शब्द से बाहर निकल जाएगा या लोगों को सच सिखाने की कोशिश में पढ़कर उन्हें फूटी आँख भी न सुहाएगा। बस उस दिन का दिन था और आज का दिन है, मैं अपने जीवन में उल्लू की तरह उडान भरने का काम करने लगा पर यह क्या ? जीवन में सभी उल्लू उडान भर रहे है, में अपढ़ पिता का बेटा और वे पढ़े लिखे शिक्षित पिता के बेटे है, मेरा उल्लू की तरह उड़ान भरना सामान्य बात है किन्तु उनका उल्लू की तरह उड़ान भरना आश्चर्यजनक है। अंधे के हाथ बटेर लगने की बात सुनी थी,आज देख भी ली। उल्लू उडान भरते ही नही अपितु उल्लुओं को उड़ान भरने से रोकते भी है और जरूरत पड़े तो पंख भी कतरते है। उल्लू के हाथ बटेर लग जाए तो वे बिना उड़े- पंख फडफडाए उडान भरना सिद्ध भी कर देते है। बस उनके पास पत्थर पर दूब उगने की स्वीकारोक्ति के साक्षियों का समूह भर होना चाहिए, भले रोज सुबह होने पर मुर्गा गला फाड़फाड़कर बाग़ दे किन्तु समूह ताल ठोककर मुर्गे की बाग़ ने देने की गवाही दे दें तो दुनियाभर के मुर्गे झूठे हो सकते है और आकाश की उडान भरे बिना उल्लू आकाश के गुणगान करे कर सकता है, मैं उल्लूबनकर उडान भरने का सपना पूरा न कर सका किन्तु बटेरों के रहते दुबारा राजपाट पाकर अपनी ही बटेर का अपने ही साथ परिणय कर अपनी ही पीठ ठोकने का अंतहीन सिलसिला चलता रहे, ईश्वर उनकी बटेर उनकी उडान उन्हें तेजोपुन्ज से भर दे ।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे,
ग्वालटोली नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल –9993376616
