नई दिल्ली। सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी आमतौर पर पूरी यूनिफॉर्म नहीं पहन सकते, क्योंकि वर्दी सक्रिय सेवा का प्रतीक है। केवल विशेष अवसरों जैसे पुलिस स्मृति दिवस, वीरता पुरस्कार वितरण या औपचारिक राज्य स्तर के समारोह में विभाग की अनुमति मिलने पर सीमित समय के लिए पहनना वैध होता है। इसके अलावा, मेडल, बैज और रैंक चिन्ह को नागरिक पोशाक पर प्रदर्शित करना पूरी तरह कानूनी और स्वीकार्य है।
यह नियम पुलिस सेवा की गरिमा, अनुशासन और पहचान बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।
पुलिस की वर्दी केवल सक्रिय सेवा का प्रतीक होती है और रिटायरमेंट के बाद इसे पहनना आमतौर पर नियमों के खिलाफ माना जाता है। भारत में पुलिस अधिनियम 1861 और इसके बाद के संशोधन स्पष्ट करते हैं कि वर्दी का इस्तेमाल केवल तैनात अधिकारियों के लिए वैध है। रिटायर होने के बाद बिना अनुमति वर्दी पहनना कानूनी उल्लंघन और फोर्स की पहचान का अनुचित उपयोग माना जाता है।
हालांकि, कुछ विशेष अवसरों पर जैसे पुलिस स्मृति दिवस, वीरता पुरस्कार वितरण, राज्य स्तरीय कार्यक्रम या औपचारिक समारोह में विभाग की अनुमति मिलने पर सीमित समय के लिए वर्दी पहनने की छूट होती है। इसके अलावा, सेवानिवृत्त अधिकारी अपने मेडल, बैज और रैंक चिन्ह को नागरिक पोशाक या औपचारिक ड्रेस पर प्रदर्शित कर सकते हैं। पूरी यूनिफॉर्म पहनने की अनुमति केवल राष्ट्रपति पदक या विशेष सम्मान प्राप्त वरिष्ठ अधिकारियों को ही सीमित अवसरों पर मिलती है।
सामाजिक दृष्टि से भी मतभेद हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि वर्दी पुलिसकर्मी की आजीवन पहचान है और इसे विशेष अवसरों पर पहनने की आजादी होनी चाहिए, जबकि अन्य मानते हैं कि यह केवल सक्रिय सेवा का प्रतीक है और इसे रिटायरमेंट के बाद पहनना अनुशासन के खिलाफ है। नियमों के अनुसार, वर्दी पहनने का अधिकार केवल सम्मान और समारोह तक सीमित है, जबकि मेडल और बैज को नागरिक पोशाक पर प्रदर्शित करना पूरी तरह वैध हैयह नियम पुलिस सेवा के अनुशासन और पहचान की गरिमा बनाए रखने के लिए लागू किया गया है।
