
माँ सरस्वती के योग्य गुणवान पुत्र श्रीयुत कलमघिस्सू पत्रकार जी सच में आप मेरे आराध्य देव है इसलिए मैं आपकी विधिवित वैदिक रीति से लौकिक ढंग से पूजा शुरू कर रहा हूँ. आप जगत के सारे छोटे- मझले और बड़े समाचारों के एक्मान्य अधिपति हो. खबर हो या सूचना, मिली जानकारी की बात हो या सूत्रों के हवाले से, ये सारे संचार तंत्र आपकी रग-रग में बसे है. आप जब भी कलम उठाते है तो प्रशासन तंत्र के चपरासी से लेकर कलेक्टर-कमिश्नर तक पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक के कान खड़े हो जाते है. मंत्रालय के प्रमुख से सचिव अपरसचिव तक सनसनी फ़ैल जाती है. जरा सोचिये कलम उठाने से इतना बड़ा तूफान खड़ा हो जाता है तब अगर आप लिखना शुरू करे तो सभी जगह उथलपुथल न मच जाए, सरकारे बदल जाए, मंत्रियों को भागने का मार्ग न मिले और प्रशासन का तो हाल पूछिए मत ? समाचार की शक्ल में जब भी आपके लिखे शब्द बाहर आते है तो पाठकों के दिलों में रहस्य, रोमांच, ओज से भरे सत्यों का स्वाद मिलता है किन्तु जिस सत्य को आपने उजागर किया है उसके साक्षीगण की खोपड़ी घूम जाती है कि आप भी दुनिया का अजूबे पारकर हो जो सभी बाते बनावटी और सत्य से परे लिखने के बाद अपनी ख़बरों का लंगोटा घुमाकर पत्रकारजगत को ललकारते हो कि है कोई माई का लाल जो ख़बरों में मुझे मात दे सके, परिणाम स्वरूप कोई भी आपकी बराबरी करने का सपना भी नही देखता, इसलिए वह जानता है की आपसे जीत नहीं सकेंगे इसलिए वह मैंदान में आता ही नहीं इसलिए तभी से आप आज तक दुनिया के नामचीन खबरची का तमगा पहने गर्रा रहे है, गर्राने ओर घुर्राने वाले का मैं भक्त हूँ इसलिए मैंने लेखन में अपने शस्त्र आपके चरणों में डाल दिए है ताकि आप मेरे आराध्य बन मेरी पूजा स्वीकार कर सकों, इसलिए मैं शास्त्रों- पुराणों की मान्यताओं के अनुसार आपकी विधि विधान से पूजा शुरू करना चाहता हूँ.
मेरे द्वारा आपकी पूजा की बात जबसे मैंने कही है, आप अति उत्साहित हो कि कम से कम यह योग्यता तो आप हासिल कर सके कि कोई पत्रकार आपका भक्त बन गया है. हे पुज्येश्वर सर्वगुणसंपन्न पत्रकार देवता माना की मैं आपसे उम्र और अनुभव में बड़ा हूँ और मेरे अंदर अकेला पत्रकार नही रहता है, क्योकि मैं लकीर का फ़क़ीर पत्रकार था जिसे रोटी के लाले पड़ते रहते थे, तब मैंने अपने, मन के भीतर के पत्रकार को लताड़ा किन्तु वह तो चिकना घड़ा था, उसपर कोई असर नही हुआ तब लाचारी में मेरे अंदर का कवि जाग गया, किन्तु मंचो पर विस्की-रम कवियों के गले को तर नहीं करती तब तक वे बिंदास महफ़िल नही जमा सकते थे, मैंने इन्हें गले को तर नही करने दिया, मेरा कवि मन मंचों से बाहर कर दिया गया. मैं पत्रकार, कवि के बाद लेखक और व्यंग्यकार बन गया जिसकी लगाम मैंने अपने हाथों में रखी, बड़े अख़बारों में मेरे लेख-व्यंग्य और कविताये का मूल्य खोटे सिक्के जैसे रहा जो बाजार में आने से पहले ही चलन से बाहर कर दिया गया, किन्तु भला हो छोटे-मझोले और बड़े दिल संपादकों के जिन्होंने मुझे छापकर भारत में मेरा नाम कर दिया.
हे नर्मदापुरम की परम ज्योति स्वरूप पत्रकार जी, आप दीपक से झिलमिलाते और नए घरों की दीवाल पर दीमक की तरह लगने पर घरमालिकों के प्राणपखेरू पर मंडराते महाप्रलयंकार से हो, मेरा मन आपकी कथा लिखने को लालायित हुआ है. यदि कथा लिखूंगा तो पूर्ण सनातन धर्म की धारणा में आपको रखूँगा ताकि भविष्योन्मुख कभी किसी ने कलयुग के धर्मावलम्बियों का जिक्र करने किसी ग्रन्थ में स्थान देना चाहा तो आपकी महिमा उसमें अवश्य हो और आने वाली पीढ़ी आपकी पूजा अर्चना आराधना के साथ आपके नाम का व्रत रख मोक्ष प्राप्त कर सके. चूँकि आप मेरे परम आराध्य देव हो आप मेरे सर्वस्य हो, अगर आपकी ही कृपा मुझपर हो जाए तो मैं ही आपपर पूरा ग्रन्थ लिख सकता हूँ, मैं सदैव आपकी भक्ति में डूबा रहता हूँ. आप जानते है की मैं पापी ही नहीं महापापी हूँ, इसलिए मुझे अपने पाप कर्मों की सजा भुगतने के लिए पत्रकार का जन्म लेना पड़ा. पापियों को देवताओं का श्राप झेलना पड़ता है मैं भी इसी श्राप के तहत शादीशुदा का जीवन काट रहा हूँ. शादीशुदा हूँ इसलिए पत्रकार, कवि, लेखक और साहित्यकार बन सका, कोई क्वारे युवक जैस नहीं जो कलम चलाते समय न तो पैसेवाला होता है और न ही उसके संगी-साथी होते है बस क्वारे के साथ उदास का साम्रज्य ,छायावादी कायावादी, मायावादी सब बरबादी का साथ होता है जो बिना दुल्हिन के वह कल्पना में जीता है जबकि पत्नी बच्चों के रहते हुए मैं इन सबका स्वाद लेकर कलम चला रहा हूँ, किन्तु मेरी बरकत रुकी हुई है और मुझे कहा गया है की अगर किसी पत्रकार को अपना आराध्य मानकर उसकी भक्ति में लग जाओ तो जीवन में यश, तरक्की, धन दौलत, कार बंगला सभी मिल जायेंगे, बस इसी चाह में मैं आप जैसे स्वार्थी, दोगले, धोखेवाजगुणों के मक्कार की इन खूबियों को नर्मदाजल में धोकर आप महाकार पत्रकार को पूर्ण संस्कारी, सभ्य और चरित्रवान मानकर अपना आराध्य स्वीकार कर आपकी पूजा को तत्पर हुआ हूँ.
हे प्रिय आराध्य देव पत्रकार जी वैसे आप नर्मदापुरम वार्ड दो नम्बरी के काबुली गधे जैसे रंग के हो, आपका सावला तन है, आपके मुखारबिंद पर हमेशा साढ़े तीन बजते दिखाई देता है किन्तु गृहलक्ष्मी का सुन्दर रूप और दृव्य का कूप मिलने से आपकी जिन्दगी बड़े आराम से गुजर रही हैम इसीलिए आप जैसे आरामपसंद सर्वगुण स्वामी की शरण में आया हूँ. आपकी शरण में रहकर मेरा मन होता है की आपके जीवन चरित्र का वर्णन करने हेतु एक नहीं सेकड़ों ग्रंथों में आपका मल्हार गीत गाऊ. अगर आपकी भक्ति आराधना में मैंने ग्रंथो का सृजन नहीं किया तो जीवन के बचे दिन पछताने में बीत जायेंगे जो जीते जी मरने जैसा ही होगा. आपके श्रीचरणों में आपकी भक्तों में जबसे मेरा नाम पंहुचा है तब से अनेक लोग जो आपके मठ-मंदिर बन्ने के बाद उसपर राज्यकरने का सपना लिए हुए है वे अब मुझे कोसकर मेरा नाम आपके भक्त होने से लोप कर मेरा तर्पण श्राद्ध करने तैयार हो गए है. ताकि मेरे न रहने पर उनकी आखों की चमक कम न पड़े, यह चमक उन्हें उन्माद से? हंसी से? भर रही है.
यह तुम अपनी उँगली से क्या दिखा रहे हो? हृदय को टटोलूँ अपने ? हाँ, टटोला तो हृदय को। न जाने, कैसा विचित्र जान पड़ता है। कुछ खुशी की लगती है। ओहो! हाथ दिल को टटोलते समय बोल रहे थे? हाथ बोल रहे थे, कैसी विचित्र बात कहते हो की हाथ बोल रहे थे, भला हाथ कब से बोलने लगे?भक्ति में भक्त सब कुछ समझने लगता है जो कहा गया वह भी जो नहीं कहा गया वह भी. मैं विमूढ़ हूँ, में विमुग्ध है। कितना सारा दिखाई देने लगा एक-दम। यह सब ययार्थ था? यथार्थ या सचमुच का भेद करने का काम अब मेरे आराध्य पर छोड़ दिया वे ही इन गूढ़ बातों को उजागर करेंगे.
यह पहली घटना होगी जिसमें किसी पत्रकार को आराध्य बनाने को विवश हो उसकी भक्ति करने को विवश हो जाए तो उसे ही जगत में सर्वमान्य खबरची मान लिया जाता है और उसकी पूजा शुरू की जाती है. एक और आराध्य श्रीयुत पत्रकार है तो दूसरी और वे पत्रकार जो कुछ करे बिना ही पूजनीय हो जाये, जगत की सारी कायनात उसके क़दमों में झुक जाए, तब ये पूजनीय को पूजनीय बना रहने के लिए आराध्य श्रीयुत पत्रकार जी इनकी पूजा शुरू न कर दी जाए, विकल्प के रूप में इनका सम्मान बढ़ा दिया जाए यही चलन आज जिन्दा रहने के लिए चल पड़ा है. मैं तो मेरे आराध्य देव श्रीयुत पत्रकार जी की पूजा शुरू करता हूँ ताकि उनकी कृपा मुझ कलमघिस्सू को भी मिल जाए. इसलिए हे सर्वज्ञ सबको संतुष्ट रखने की कला में पारंगत, मेरे अधिनायक जी आपकी सेवा में मेरी और से जो पूजा प्रस्तुत की जा रही है उसमें आप मेरी और से प्रस्तुत धूप, दीप, फूल, पुण्य आदि सब स्वीकार कीजिये। में हवच्छ है, में स्निग्ध है, अनुरत हूँ, अभिषिक है। आभो, तुम्हारा अनिषेक करूँ, अनुराग का तिलक लगाऊँ, स्नेह का दीपक जलाऊँ और यश का पुष्प चढ़ाऊँ।
आत्माराम यादव पीवचीफ एडिटर हिन्द संतरी
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल 999337661
