जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन की तरफ से यह फैसला नथम के तहसीलदार द्वारा इस स्मारक को अनुमति न दिए जाने के बाद आया है। तहसीलदार द्वारा अनुमति न मिलने के बाद एक याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में रिट दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस स्वामीनाथन ने इस बात पर चिंता जताई कि आज की पीढ़ी को भारत के औपनिवेशिक शासन का इतिहास पता नहीं है, न ही उन्हें इस गुलामी से मुक्त कराने के लिए लड़ी गई लड़ाइयों के बारे में ही जानकारी है।
जस्टिस ने कहा, “राज्य में अगर स्टैन स्वामी की याद में पत्थर का स्तंभ लगाया जा सकता है, उसके लिए अनुमति कि आवश्यकता नहीं पड़ी, तो निश्चित रूप से नथन कनवाई युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने किए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”
गौरतलब है कि अदालत ने जिन स्टेन स्वामी का जिक्र हुआ है वह जेसुइट पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता थे। इनका नाम भीमा कोरेगांव में भड़की हिंसा से भी जोड़ा जाता है, 2021 में इनकी मौत के बाद मद्रास हाई कोर्ट ने उनकी याद में एक स्मृति स्तंभ बनाने की अनुमति दी थी।
क्या हुआ था नथम कनवाई युद्ध में?
इस स्मारक को बनाने के लिए याचिका लेकर आए वकील ने तथ्य रखा कि वर्ष 1755 में नथम कनवाई इलाके में मेलूर कल्लर समुदाय और ब्रिटिश सेना के बीच में एक भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में कल्लर समुदाय विजयी रहा था। याचिकाकर्ता के मुताबिक यह युद्ध कोइलकुड़ी के तिरुमोगुर मंदिर की वजह से हुआ था। इस मंदिर से ब्रिटिश सैनिकों ने कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में पीतल की मूर्तियां और अन्य कीमती सामान लूट लिया था। इसके बाद जुटे कल्लर समुदाय ने युद्ध के जरिए इन मूर्तियों को वापस पा लिया।
