यह सख्त आदेश पायल नामक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शिवपुरी जिले में कुछ संगठित गिरोह युवतियों को बंधक बनाकर उनसे जबरन देह व्यापार करवा रहे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋषिकेश बोहरे ने अदालत को बताया कि इस संबंध में पुलिस और प्रशासन को कई बार शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब पर अदालत ने तीखी आपत्ति जताई। शासन ने अपने जवाब में इस पूरे मामले को आपसी पारिवारिक विवाद बताया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यदि आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह केवल निजी विवाद नहीं बल्कि संगठित अपराध, मानव तस्करी और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला बनता है।
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस का दृष्टिकोण बेहद चिंताजनक है। अदालत ने कहा कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी सबसे अहम है। इसी क्रम में कोर्ट ने आईजी को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि केवल फाइलों और कागजी जवाबों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सोच और कार्यशैली में बदलाव जरूरी है।हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि वर्ष 2014 से अब तक ग्वालियर संभाग में दर्ज सभी गुमशुदगी मामलों का विस्तृत ब्योरा पेश किया जाए। इसमें यह जानकारी भी शामिल करनी होगी कि कितनी लड़कियां लापता घोषित की गईं, कितनी को बरामद किया गया और कितने मामलों की जांच अब तक लंबित है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि इन आंकड़ों के विश्लेषण के बाद पुलिस प्रशासन पर और भी सख्त निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले शिवपुरी जिले के पुलिस अधीक्षक को भी इस मामले में तलब किया जा चुका है। हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करना या उन्हें घरेलू विवाद बताकर दबाना कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।अदालत के इस सख्त रुख के बाद पुलिस महकमे में हलचल मच गई है। अधिकारियों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं और आंकड़ों को संकलित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। वहीं महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को अहम बताते हुए कहा है कि इससे लड़कियों की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
