वर्षों से नगर निगम द्वारा शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन शहर की करीब 80 प्रतिशत पाइपलाइनें नालों में डूबी हैं जिससे पानी में गंदगी और अशुद्धता बढ़ रही है। नर्मदा का पानी भले ही शहर तक पहुंचता है लेकिन पाइपलाइन की खराब स्थिति के कारण वह पानी जैसे ही घरों तक पहुंचता है वह दूषित हो जाता है।
वर्ष 1950 में जबलपुर नगर निगम की स्थापना के बाद नगर निगम ने कई बार पेयजल व्यवस्था में सुधार के दावे किए। लेकिन अब तक किसी भी सरकार या प्रशासक द्वारा यह समस्या पूरी तरह से हल नहीं हो पाई है। एशियन डेवलपमेंट बैंक और अमृत योजना जैसी परियोजनाओं के तहत नगर निगम को करोड़ों रुपये मिले लेकिन शहर के पानी की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।शहर की बढ़ती आबादी के साथ पानी की खपत भी बढ़ी है लेकिन पाइपलाइन की पुरानी और जर्जर अवस्था के कारण पानी में कई तरह की गंदगी समाहित हो जाती है। साथ ही नालों और सीवेज सिस्टम के पास से गुजरने वाली पाइपलाइनें शहरवासियों के लिए एक बड़ी चिंता का कारण बन चुकी हैं।
नागरिकों का कहना है कि उन्हें कभी-कभी पानी की गंध और रंग देखकर यह डर लगता है कि क्या उनका स्वास्थ्य इससे प्रभावित होगा। शुद्ध पेयजल की समस्या न केवल शहरवासियों के जीवन में परेशानी का कारण बन रही है बल्कि इससे संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
शहरवासी लगातार नगर निगम से शुद्ध पानी की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार और प्रशासन की तरफ से इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। अब यह देखना बाकी है कि क्या सरकार इस समस्या का समाधान कर पाएगी ताकि जबलपुर के नागरिकों को शुद्ध और सुरक्षित पेयजल मिल सके।
