डार्क फाइबर विवाद ने रोके एनएसई के रास्ते
एनएसई का आईपीओ कई सालों से अटका हुआ था, जिसका मुख्य कारण 2010-2014 के बीच हुए तथाकथित डार्क फाइबर केस हैं। आरोप था कि कुछ हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स को एनएसई के को-लोकेशन सर्वर तक खास एक्सेस दिया गया था, जिससे वे अन्य बाजार भागीदारों की तुलना में तेजी से ट्रेडिंग कर पाते थे। अप्रैल 2019 में, सेबी ने एनएसई को कथित गैर-कानूनी मुनाफे के रूप में 62.58 करोड़ रुपये लौटाने और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को मार्केट से जुड़े पदों पर कार्य करने से रोकने का निर्देश दिया था। 2022 में एक्सचेंज पर 7 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था, जिसे बाद में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल ने रद्द कर दिया।
रिटेल निवेशकों की बड़ी भागीदारी
एनएसई ने पिछले साल जुलाई में जानकारी दी थी कि लगभग 1.46 लाख रिटेल निवेशक उसके शेयरों में निवेश कर चुके हैं। ये शेयर ग्रे (अनलिस्टेड) मार्केट में हैं और हर निवेशक के पास की कीमत 2 लाख रुपये से कम है। इसके बावजूद रिटेल निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि आईपीओ के बाद इस हिस्सेदारी और बढ़ सकती है, क्योंकि निवेशकों को लंबे समय से एक्सचेंज के शेयर में संभावित मुनाफा नजर आ रहा है।
एनएसई के लिए रास्ता अब साफ
सेबी से एनओसी मिलने के बाद एनएसई को अपने पब्लिक इश्यू को समयबद्ध तरीके से लॉन्च करने का अधिकार मिलेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, आईपीओ के लिए निवेशक पहले से उत्साहित हैं और बाजार में इसकी मांग अच्छी रहने की संभावना है। लंबे समय से रुका यह आईपीओ न केवल एनएसई के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भारतीय शेयर बाजार में भी नया उत्साह और रिटेल निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने में मदद करेगा।
