इन 6 पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत उनकी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन AIP तकनीक होगी। यह तकनीक पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे बड़ी कमी को दूर करती है। सामान्य पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आना पड़ता है या स्नॉर्कल का उपयोग करना पड़ता है जिससे उनका लोकेशन दुश्मनों के लिए पता चल सकता है। AIP तकनीक से लैस पनडुब्बियां हफ्तों तक पानी के भीतर रह सकती हैं कम शोर करती हैं और दुश्मन की नजर से लंबी अवधि तक छिपी रह सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इन पनडुब्बियों के शामिल होने से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन और मजबूत होगा। AIP पनडुब्बियां टॉरपीडो एंटी-शिप मिसाइल क्रूज़ मिसाइल और समुद्री माइन जैसे पारंपरिक हथियारों से लैस होंगी जो उन्हें बेहद खतरनाक और प्रभावी बनाती हैं।प्रधानमंत्री मोदी और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की हालिया बैठक में दोनों नेताओं ने कहा कि भारत-जर्मनी हर क्षेत्र में मिलकर काम कर रहे हैं और यह परियोजना इसके नए अध्याय की शुरुआत है। यह समझौता भारतीय नौसेना की क्षमता को नए स्तर पर ले जाएगा और भारतीय रक्षा उद्योग को तकनीकी रूप से मजबूत बनाएगा।
मझगांव डॉकयार्ड में इन पनडुब्बियों का निर्माण न केवल भारत की नौसेना की ताकत बढ़ाएगा बल्कि देश के रक्षा क्षेत्र में स्थानीय उत्पादन रोजगार और तकनीकी विशेषज्ञता को भी बढ़ावा देगा। यह परियोजना देश के आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।इस डील को भारतीय नौसेना के इतिहास की सबसे बड़ी पनडुब्बी परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। रणनीतिक दृष्टि से देखें तो AIP तकनीक वाली पनडुब्बियों की मौजूदा वैश्विक नौसैनिक युद्ध में अहम भूमिका है। इससे भारत की समुद्री ताकत और क्षेत्रीय प्रभुत्व दोनों मजबूत होंगे।
