
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार प्रधान संपादक हिन्द संतरी डाट काम
आजकल राजनीति को कुत्ता बनाकर उसके गले में जंजीर डालकर इधर-उधर, इस खेमे से उस खेमे में खीचने-तानने का चलन शुरू हो गया है, जिससे इस बात की गवाही मिलती है की राजनीति कुत्ता बन गई है इसलिए राजनीति करने वाले दलों में अब हरेक घर का आदमी मिल जाएगा जो उस विशेष दल का सदस्य होकर कुत्ते की अर्थात राजनीति की जंजीर को थामे रखता है। राजनीति जब से कुत्ता बनी है तब से वह लोकतंत्र के सिर को नाट्यमंच समझ चुकी है और एक से एक कहानी का मंचन कर विश्वपटल पर कई नेताओं को ख्याति दिला चुकी है। चाय बेचने बाले, पकोड़े बेचने वाले तमाम नेता राजनीति में घुसकर समय- को मुट्ठी में करने के लिए जीजान से लगे है और उनकी कोशिश है की वे समय के गले में जंजीर डालकर अजर अमर हो जाए और इतिहास उन्हें विकासपुरुष में स्वीकार कर ले, पर समय के गले में जंजीर डालने के उनके प्रयास से समय उनकी पकड़ में नहीं आ सका है, और वे गुस्ताख भूल गए की समय कोई कुत्ता नहीं जो वे उसके गले में जंजीर डाले। राजनीति में मोलभाव विकास के पेट में होने से शुरू होकर फाइलों में जन्म और गाँव शहरों में उसके क्रियान्वयन होने तभा अंतिम बिल भुगतान तक चलता है। आपके या मेरे किसी के भी राजनेता सांसद, विधायक, पार्षद, पंच सरपंच हो सबके दिलों में राजनीति की आंधी चलती है और वे खुद को विकासपुरुष के रूप में अपनी छबि बनाने के लिए चिंता में डूबे होते है की कहा से राशि आये और कहाँ खर्च हो?बस इन चिंतामणिओ का काम की प्राथमिकता पहले खुदका, फिर रिश्तेदार, फिर सगे सम्बन्धी मित्र होते है जनता तो बाद में आती है जो राजीव गांधी के कथन अनुसार पाइप के पंद्रह प्रतिशत की हक़दार होती है शेष पिच्चासी ये ही चिंतामणिओ का पाइप हजम कर जाते है।
हमारे यहाँ इस बात पर बड़े ही अच्छे तरीके से घरों में मंथन होता है, जरा ध्यान दीजिये। जा राजनीति की ठठरी बंध जाए सुसरी शहर के विकास में रोड़ा अटकाए कोई ढंग को काम नहीं होने दे रही है, शहर के मालिशवीर रमुआ नाई ने स्थानीय नेता के सिर पर ठंडाई का लेप लगाकर पानी से सिर की चम्पी करते हुए अपनी बात शुरू की और बोला भैया जी जैसे शहर भर के नेता एक दुसरे के प्रति ईष्यालु होते हुए एक दुसरे को नापने पर तुले होते है वैसे ही आपके सिर के बाल आपस में गुच्छम गुच्छा हो ओछी राजनीति के शिकार हो गए है, सुसरे बालों की उलझी लटों को जितनी देर में सुलझा पा रहा हूँ उतनी देर में तो देश की एक समस्या का हल आसानी से निकाल सकता था। नेता जी पहली बार रमुआ की उलटी खोपड़ी पर नाराज हुए और बोले, क्यों रे रमुआ इतनी साल से बालों की कटिंग करते समय मेरे सिर के बाल तुझे मुलायम और खूबसूरत दिखाई देते थे, आज किस शैतान की हजामत के बाद तुझे मेरे बालों की उलझी लटों से आध्यात्म का ज्ञान आ गया जो तू मुझे ताने देकर मेरे बालों का अपमान करते समय जरा भी डरा नहीं?
साला कहा करता था आप माईबाप हो शहर की समस्या सुलझाने और पीढ़ी दर पीढ़ी चुनाव लड़कर जनता की सेवा करने में इस शहर में आपके ही परिवार ने अवतार लिया है, इसलिए आप जैसा इस दुनिया में कोई नहीं? फिर कौन से खेत की मुली तुझे भा गई जो बेधड़क अपने भविष्य पर ताला लगाने की गुस्ताखी करने की हिमाकत कर अपनी टियुनिंग बिगाड़ इस शहर से अपना दाना पानी बंद करने पर तुल गया है? रमुआ नेता जी की बात सुन पसीना पसीना हुआ अपने मुंहफट की सजा से काँप उठा और झट पांसा फैका, – माईबाप हमारी कई पीढ़िया आपकी पीढ़ियों की चाकर रही है और आप हमारे मालिक हो, और हमारी आने वाली सात तो क्या सत्तर पुश्ते आपके खानदान की सेवा करने के लिए ही पैदा होंगी, असल आज एक राह भटका खूसट तिलक-चोटीधारी पत्रकार दूकान खोलते समय भुनसारे ही आ गया जिसे न अपने सिर के बालों की चिंता थी और न ही मूंछ ढाढ़ी की. लम्बी सी चोटी को मोटी करवाते समय पुरे सिर को सफाचट कर मूंछ दादी का मैंदान भी खाली छुडवा लिया, पता नहीं उसकी क्या मनसा रही होगी हाँ वह शहर के अंधाधुंध विकास को आकाश तक महिमामंडित करने वाले नेताओं के प्रभाव की बात कर रहा था और मीनमेख निकालते हुए अभाव और कुप्रभाव का रोना रो रहा था, पता ही नही चला की उसकी बातों का जादू कब मेरे स्वभाव में उसके विचारों की ट्यूनिंग में रंग गया और मैं उसकी ट्यूनिंग को किसी आग्नेय शस्त्र की भाँती आपके समक्ष बढ़ा चढ़ा कर इस्तेमाल करते समय भूल गया की वह करमजला आप जैसे अक्ल और शक्ल के धनी जनता के परम सेवक को चिंतामणि की तुलना देकर मेरा इस्तेमाल कर गया । रमुआ बोला में लाज से लेकर बगीचे की, महुए की कच्ची से लेकर अंगूर की पक्की मदिरा तथा रेत खदान से लेकर भसुआ का अवैध कारोबार करने वाले सभी माफियाओं की कसम खाता हूँ आज के बाद मेरी दूकान में आने वाले कोई भी दिलजले पत्रकार, कलाकार या कोई भी आकार प्रकार वाले की चिकनी चुपड़ी बातों को सुनने के बाद उदबत्ती की खुशबु से दुकान को और अपने मन को पवित्र करने के बाद ही आपके यहाँ तेलमालिश और चम्पी के लिए कदम रखूँगा। रमुआ काफी तेलोंमशक्कत के बाद घर लौटा तो उसे लगा जैसे कुरुक्षेत्र का महाभारत अकेला जीतकर आया है।
जान बची और लाखों पाए, रमुआ नाई नेताजी की हजामत बनाकर सीधे पत्रकार के पास पहुंचा और बोला अच्छा हुआ जो विकास की बात ही कर सका अगर तुम्हारी कही सारी बातें कहता तो मेरा दो दाना पानी ही इस शहर से उठ जाता। पत्रकार ने रमुआ की चुटकी ली, किस मठ के मठाधीश से मिल आये हो? भई तुम्हे पता होना चाहिए की इन मठाधीशों को अक्ल का जीर्ण होता है, एक तो मठाधीश दुसरे शहर-गाँव के मंदिरों और ट्रस्टों के ट्रस्टी, दुसरे समाजसेवक और तीसरे वे जननायक यानी नेता ! इतना सब कुछ होने के लिए उनमें उल्लू के बराबर या नटवरलाल गधे के बराबर अक्ल तो होगी ही ? फिर तुम जैसे चम्पीमास्टर उनसे अपनी अक्ल भिडा आए किन्तु बर्दास्त के काबिल बात नहीं कर सके। सुबह से शाम तक उनसे चिमनी लालटेन की तरह भभके मारते लोग मिलते है, जीरो पावर से 444 पावर के लोग मिलते है वही पर कभी कभार एक से एक लालबुझक्कड़ मिलते है जिनकी अपनी अक्ल की दाढ़ होती है, ये सारी अक्ल की दाढ़े इस समाज को जीने लायक नहीं रहने देना चाहती है।
समाज में वैमनस्यता फैलाना इन माननीय चिंतामणिओं के अक्ल की ही मेहरवानी से होती है, पर वह अक्ल को ये कछुआ की तरह चारों और से सिकोड़ लेते है जिससे इन पर कोई शक नहीं करता है। गजब की बात यह है कि ये सभी चिंतामणि नेतागण सभी अपने अपने क्षेत्र के पहुचे हुए मठाधीश जैसी अकल रखते है, यानी सबकी सोच एक सी है, मतलब किसी के भी पास अकल नहीं है, पर अकल की दाढ जरूर है। अकल रखने वाला व्यक्ति अकल की ही बात करेगा चाहे वह अकल एक रत्ती भर की भी न हो, पर जो बेअकल है वही सबसे बडा अकलबाला है जिसके पास अक्ल की दाढ है जिससे वह जब भी शहर के विकास की बात करेगा तो उसकी दाढ़ वाली अकल का दायरा मात्र उस चिंतामणि नेता के निजी होंगे वही उसे पूरा क्षेत्र समझ आता है, वह अपने सारे निजी विकास को ही क्षेत्र का विकास मानकर चलता है जैसे कछुआ कुँए को ही सागर समझ फुला नही समाता है।
हे विकासपुरुष चिंतामणियों, आपकी चिंताओं की बाढ़ में सारा विकास हथेली में रेत की तरह खिसका जा रहा है। कृपया आप आप अपने स्कुल कालेज, ट्रस्टों के मोहजाल से मुक्तहोकर आम गरीब व्यक्ति की चिंता करना शुरू कीजिये और गाल बजाने पेपर में छपवाने की बजाय थोड़ा सा धरातल पर काम करके दिखाईएगा ताकि आम गरीब व्यक्ति शकून से जी सके। आदमगढ़ रेल्वे पुलिया का विकास चार साल से बहा जा रहा है जिसके प्रबल वेग से यहाँ के नागरिकों का शहर से सम्बन्ध कट हो गया है। आप सभी शहर के चिंतामणि विकासरत्नों से एक निवेदन है कि जब हाथों में साफ सफाई के साथ केमरामेनों को लेकर चलों तो प्लीज आदमगढ़ की चार साल से गटर बनी नाली को साफ करके इस मार्ग को गटरमुक्त कर आदमगढ़, रसूलिया, ग्वालटोली आबकारी से सतरास्ता पहुँच पुलिया आदि पर ध्यान दीजिये और रसूलिया की किसी भी मोहल्ले गली से शांतिनगर आईटीआई क्षेत्र का मार्ग रेलवे लाइन से अंडरग्राउंड मार्ग देकर दूरी कम कर नागरिकों का समय और खर्च बचाकर उपकार कीजिये अथवा शहरीकरण के विकास में मिनी बस या नियमित आटों की व्यवस्था कराइयेगा। हे चिंतामणियों, जो विकास पुरूष बनने की दौड में है वे भी सुने, यहा के हर वार्ड के लोग आप सभी के कुल्ला करने से जो विकास की प्रलयंकारी आंधी पेपरों मे चल रही है, उसमें बहे जा रहे है। हे प्रजारंजनों बहुत हुआ अंगूठा कटाकर शहीद का दर्जा पाने का खेल बंद कीजिये ? आम गरीब, मजदूर, सर्वहारा वर्ग का व्यक्ति ‘‘अजगर करें न चाकरी, पंछी करें न काम, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम‘‘ मूलमंत्र से छुटकारा पाना चाहता है, आप अपने मन के अजगर से काम कराईयेगा, ताकि विकासपुरुष बनने की आपकी चिंता की आग में जल रहे आप जैसे चिंतामणिओं नेताओं की चिंता समाप्त हो सके ।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
