नई दिल्ली। डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने हाल ही में एक विवादास्पद बयान देकर उत्तर और दक्षिण भारत में महिला शिक्षा और सशक्तिकरण पर बहस छेड़ दी है। चेन्नई के कैद-ए-मिल्लत महिला विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मारन ने कहा कि उत्तर भारत में अक्सर लड़कियों को घर में रोका जाता है और उन्हें केवल घरेलू काम करने के लिए कहा जाता है, जबकि उन्हें पढ़ाई या नौकरी के अवसर नहीं मिलते।
मारन ने दक्षिण भारत के मॉडल की भी जमकर तारीफ की।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में लड़कियों को पढ़ाई और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उन्होंने मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उनकी द्रविड़ियन सरकार की सराहना करते हुए बताया कि उनके नेतृत्व में लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष कदम उठाए जा रहे हैं। कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने भी हिस्सा लिया और छात्राओं को लैपटॉप वितरित किए।
मारन ने कहा, हम चाहते हैं कि हमारी लड़कियां पढ़ें, शिक्षित बनें और अपने भविष्य में सशक्त हों। वहीं, उत्तर भारत में लड़कियों को केवल घर के कामकाज तक सीमित रखा जाता है।
उन्होंने तमिलनाडु को भारत का सबसे उन्नत प्रदेश बताते हुए द्रविड़ियन मॉडल की विशेष प्रशंसा की।
आंकड़े बताते हैं अंतर
2011 की जनगणना के अनुसार, तमिलनाडु में 7 साल से ऊपर की उम्र की महिला साक्षरता दर 73.44% है। वहीं उत्तर भारत के राज्यों में यह दर कम है:
उत्तर प्रदेश – 57.18%
हरियाणा – 65.94%
राजस्थान – 52.12%
हिमाचल प्रदेश – 75.93%
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतर सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से उत्पन्न होता है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
मारन के बयान पर उत्तर और दक्षिण भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं।
कुछ लोगों ने इसे विभाजनकारी टिप्पणी कहा, जबकि अन्य ने महिला शिक्षा और समान अवसरों पर बहस को बढ़ावा देने की बात कही। सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस बयान पर बहस तेज हो गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि दयानिधि मारन का बयान केवल विवाद नहीं, बल्कि भारत में महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और सामाजिक समानता के मुद्दों पर नई बहस को जन्म देने वाला कदम है। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसकी प्रतिक्रियाएं अभी भी सामने आ रही हैं और यह मामला राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है।