
आत्माराम यादव प्रधान संपादक हिन्द संतरी डाट काम
जीवन ने जब अखबार में पढ़ा -वह पागलों की तरह सडक़ो पर नाच रहा है आखिर ऐसा कया हो गया में उससे मिलने के लिये सडक़ पर दौड़ पड़ा । वह कभी भांगड़ा करता,कभी भरत नाट्यम और कभी शादी ब्याह का नागिन और कभी कबड्ïडीनुमा वह नाच रहा था मैंने उससे खुश होनेका कारण पूछा तो वह बोला- अरे भाई तुम्हारे दिमाग के कबूतरखाने के में विचारों के जंजाल उलझे पड़े है तुम इन विचारों को जोड़तोड़ के कुछ भी हेडिंग देकर अपने कम्पूटर की मेमोरी भरने के साथ अख़बारों के ईमेलों पर छपास के लिए भागते हो तुम्हे क्या बताऊँ? हाँ जव अपने जीवन में सुख का अकाल पड़ जाता है तब मन गम के सागर में हिलोरे मारने लगता थाई तब में इस दुनिया के सारे नृत्यों का अभ्यास अपने मन की बल्ले बल्ले कर लेता हूँ।
मैंने प्रश्न किया – आखिर क्या हुआ ?
वह बोला –इस बार बड़ी बेइज्जती हो गई ।
– किसकी और कैसे? मैंने आश्चर्य से पूछा ।
– कानून की, उसने डिस्को करते हुए कहा ।
– आखिर कानून की कैसी बेइज्जती- कुछ खुल कर कहो जीवन लालजी, हमारा दिल अपने शरीर में स्ट्रोप डांस करने लगा था ।
– तो सुनो भैया- इस देश में कब कौन सा कानून आ टपके, पता ही नहीं चलता? अंग्रेजों के कानून कब चले गए और हमारे कानून का आ गए पता ही नहीं चला। न मुझे पता है न कानून लागु करने वालों को ही कानून का अता पता नहीं वे, शिकायत के बाद कानून देखने के बाद रपट लिख रहे है,और कह रहे है की कानून कम हो गए जिन्हें अब उंगलियों पर गिना जा सकता है पर पढ़ने में समझ ही नहीं आ रहे है।
– कानून बनाये गये है हम देश के लोगों के लिए ताकि देश के सभी इंसान सुख सुविधा से रह सका, इस बात को स्वीकारते हो न आप।
मैंने कहा- हां बिल्कुल सच कह रहे हो जीवन भैया
– लेकिन ये कानून आज इन्सानों को कितना कष्टï पहुंचा रहे है । ये कानून की आड़ लेकर पुलिस से लेकर इनकम टैक्स ड्रग इंस्पेक्टर से लेकर फुड इंस्पेक्टर,एसडीएम से लेकर पटवारी और ग्राम कोटवार से लेकर जिलाधीश तक सिर्फ इंसानों को परेशान करने के लिये ही इसका उपयोग कर रहे हे – कहो हां – जीवन लाल ने मुझसे कहा।
– हां बिलकुल सत्य चिन्तन है । मैंने उसकी हां में हां मिलकर स्वीकृति दी ।
– फिर ये कानून को तोड़ने पर किसकी हंसी उड़ती है। ये कानून की न – कहो हां ।
– मैंने कहा – हां, पर क्यों और क्या हुआ कुछ कहिए न?
– देखों दिमागी कबूतरखाने वाले भैया, पुरे शहर में गली गली सड़क सड़क पावरफुल कैमरे लगा दिए गए ताकि अपराध होने पर जुरमाना लिया जा सके? सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक रेत खुलेआम चोरी केमरे में दर्ज हो रही है। शाम को किसी भी बाजार में चले जाइए बाजार सड़कों पर लगने लगता है और यातायात ठप्प हो जाता है, पुलिस वाले से लेकर नगरपालिका ने किसी पर एक रूपये जुरमाना कर दिया हो, गधे के सिंग की तरह रसीद ढूंढते रह जायोगे? बीड़ी सिगरेट खुले आम पीने पर जुर्माना है, पर कानून के रक्षक ही खुले में बीड़ी सिगरेट और दारु पी रहे हो और खुले रूप से सडक़ पर थूक रहे हो और सार्वजनिक स्थल पर लघुशंका कर रहे हो तो तुम्हारा कानून क्या कर रहा है, कहाँ गया कानून जो सब देख रहा है ।
– मैंने कहा -बिल्कुल ठीक कहा आपने।
– जीवन ने अपनी भड़ास निकालना जारी रखा और कहा अपने हक़ के लिए कोई भी व्यक्ति कोर्ट के आदेश से हड़ताल नही कर सकेगा, अब गरीब कहा मरेगा जो अपने मौलिक अधिकार के लिए आवाज तक न उठा सके? मैंने हामी भरी तब वह फिर बोला-अगर हड़ताल की जायेगी – कानून की हंसी उड़ी या नहीं ? और हड़ताल पर रोक सिर्फ इसलिये लगाई गई कि आम जनता को इससे कष्ट ना हो, कहो न हां ।
– देखों दिमागी कबूतरखाने वाले भैया एक बात बताईयें- ये मंत्री जब सडक़ से गुजरते है तब घण्टों तक रास्ता बंद रहता है तब हमें कष्ट नहीं होता । जब मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आते है तो सडक़ के रास्ते बदल दिये जाते है, तब कष्ट नहीं होता । लेकिन उन कष्टों पर इनका ध्यान नहीं है । तब देश के किसी भी शहर या गाँव में रहने वाली जनता के कष्टों पर इनका ध्यान नहीं जाता— जब ये भ्रष्टाचार करते है, तब रातों रात इनकी जमानत हो जाती है, जब ये देश की अस्मिता पर देश के सेना पर या देश की नारी के चरित्र को वेशर्मी से बखान कर देशद्रोह का काम कर सरकार में बने रहते है और देश का मुखिया वोटों की राजनीति के लोभ में अपनी सरकार के ऐसे नेता को गोद में बिठाये देश के संविधान की हत्या के लिए पूरी ताकत से जुटकर कानून की धज्जियां उडाए तब किसी को कष्ट नहीं होता? वोटबैंक की राजनीति जिस दिन कानून को शर्मसार करे क्या यह देश के संविधान का घोर अपमान नहीं और इससे जब पूरा देश थू थू कर रहा हो तब इन सत्ताधारी नेताओं की आँखों की शर्म कहाँ चली गई जो कानून की रक्षा नहीं कर सके, तब इन्हें कष्ट क्यों नहीं होता है । पदों पर रहने वाले सत्ता में संविधान की शपथ लेने वाले इन नेताओं की चोखट पर आकर कानून क्यों दम तोड़ देता है, क्यों कानून इनकी खुशामद कर रहा है, क्या इससे विश्व के अन्य देशों में हमारे देश को सम्मानित किया जाता है या अपमान से तिरष्कृत किया जाता है,यह बात देश की सरकार क्यों नहीं समझती है? सटोरियों, शराब माफियाओं, जंगल माफिया, जमीन माफिया, वन्य जीव माफियों आदि के दलाल सरकार में मस्तक पर विराजे है, एक तो उन पर मामला बनता नहीं, अगर ज्यादा शोर शराबा या दबाव हो तो छुटपुट धाराओं में दिखावट के लिए मामले बन्ने के साथ ही तत्काल जमानत हो जाती है तब किसी न्याय प्रणाली से जुड़े व्यक्ति को कष्ट नहीं होता । देश को बचाने के नाम से लगे कानून को हटाकर नया कानून बनाते समय इन्हें कष्ट नहीं होता ।
इन नेताओं के रिश्तेदार कलेक्टर कमिश्नर बनकर जिस जिले में पदस्थ हो वहा की सरकारी जमीने, छोटे घांस की जमीने गोंड भील आदिवासी की जमीनें तमाम कानूनी वन्दिश के बाद भी बेचने की अनुमति मिलने पर इन कलेक्टर-कमिश्नर के रिश्तेदारों के नाम से होने के बाद ये अधिकारी अपना पृथक एनजीओ आदि बनवाकर स्कुल कालेज, ट्रेनिंग सेंटर,कृषि फ़ार्म आदि के मालिक हो गए किसी प्रदेश सरकार की हिम्मत नही हुई जो इस पर एक श्वेतपत्र लाकर जनता के समक्ष सार्वजनिक कर सके। इतना ही नहीं इन नेताओं के रिश्तेदार पुलिस के शीर्ष अधिकारी होते है, अदालत में प्रेक्टिस करने वाले होते है, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी शुन्य होने के बाद भी किसी को कष्ट नहीं होता । इनके लिये मुफ्त की प्रथम श्रेणी रेल यात्रा हवाई यात्रा के आलावा टोल टेक्सों से छूट की व्यवस्था होती है और जनता टेक्स पर टेक्स, टेक्स पर टेक्स देकर मरती है तब किसी को कष्ट नहीं होता ।आम नागरिक को न्याय के नाम से उम्र गुजारने के बाद भी न्याय नहीं मिलता तब इन्हें कष्ट नहीं होता । सबसे अधिक उजली कालर का बताते हुए इन्हें कष्ट नहीं होता । ये कुर्सी पर बैठे व्यक्ति भी तो हमारे समाज से आये हुए है – ये भ्रष्टाचार, गबन धोखाधड़ी बेईमानी नहीं करते ऐसा सोच कैसे सकते हो? जीवनलाल जी कई तरह के विचित्र नृत्य कर रहा था वह नृत्य रोककर अब भाषण के मूड में आकर प्रश्नों की झड़िया पर झड़िया लगता रहा और कहने लगा की यह यह सच नहीं है। उसकी सारी बातें सच लग रहीं थीं । वह कहे जा रहा था- आज देश में एक नया आतंक जन्म ले चूका है और उसे न्याय का आतंकवाद कह लीजिये, जनता को न्याय का आतंकवाद जीने नहीं देता और नेता को न्याय के आतंकवाद से उसको जूं तक नहीं रेंगती और और सरकार न्याय के इस आतंकवाद पर मौन धारण किये अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने से नपुसंक बनी हुई है और जिसे इससे कोई लेना देना नहीं है वह मुफत को सलाह ,निर्देश देने में किसी से कम नहीं पड़ रहे है।
मैं जीवन लाल की बातों को सुनता रहा, किन्तु मैंने कुछ भी नहीं कहां । क्यों व्यर्थ में पंगा लूँ, अगर उसे ज्ञान देने का प्रयास किया तो उसे ज्ञान का अजीर्ण हो जाता है और वह तुरंत गली में कच्ची शराब की दुकान की और भागता है जहा उसे सम्मान से दो दिलास मुफ्त में पीने को मिल जाती है और वह अपना सारा ज्ञान बाटने के लिए पागल सा हो जाता है, मैंने उसे इतने समय तक झेला तो उसने मुझे आश्वस्त किया की आपको छोड़ जो मीडियाकर्मियों ने मेरी बात को नही सुना तो उन्हें मुफत में बदनाम कर दूंगा- वह जानता है की उसके यहाँ की पुलिस सत्यवादी राजा हरिश्चंद के पदचिन्हों पर चलते हुए जो भी अच्छा बुरा करती है वह किसी के लिए न्याय का आतंकवाद हो सकता है किन्तु पुलिस के भय से उनका उठाना बैठना और करना सच ही होता है। भले पुलिस अपने सरकारी केमरे के सच को झूठ साबित करने के लिए उन केमरों को फ़िल्मी शूटिंग के लिए इस्तेमाल मान ले, पर तब भी केमरे का सच उजागर करना न जीवन लाल के हाथ में है और न ही मेरे, मैं जानता हूँ की अगर में केमरे का सच उजागर करू तो अदालत तक दौड़ लगानी पड़ जाए और भले में अदालत पुलिस के दामन पर दाग न लगने दे , किन्तु इसके लिए मुझपर मानहानि के लिये इन्हें एक नया जन्म लेना होगा ।
आत्माराम यादव
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
