
आत्माराम यादव पीव प्रधान संपादक हिन्द संतरी डाट काम
ऋग्वेद में वीणापाणि माँ सरस्वती को महान् यशों से युक्त व अन्य नदियों में प्रधान सर्वश्रेष्ठ जलवाली नदी माना है वही वे विद्या के अलावा शीघ्रगामी एवं ऋण से छुटकारा दिलाने वाली अधिक गुण वाली बताया है। वीणापाणि माँ सरस्वती विद्या की देवी है जिसकी कृपा प्राप्ति हेतु अनेक साधन है जिसमें ऋग्वेद ने उनकी उपासना का सरलतम मार्ग भी सुझाया है जिसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का परमोत्कर्ष उत्तम साधन कहा गया है। वेदोक्त दर्शन की उपासना ओर मंत्र को ग्रहण कर जो नित्य माँ की उपासना करते है वे वेदविदित परिणामों सहित माँ की कृपा प्राप्त करते है। माँ सरस्वती अपने भको को समर्थता ओर विद्या प्राप्ति के विघ्न्न दूर कर ब्रह्मस्वरूपिणी माँ के स्वरूप का ज्ञान की सुगमता से प्राप्ति कराती है। प्रस्तुत श्लोक से अपनी बात शुरू कर रहा हूँ- अम्बितमे नदीतमे देवीतमे सरस्वति। अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमग्य नस्कृधि ॥ ऋग्वेद 2/41/16 अर्थात -‘मातृगणों में श्रेष्ठ, नदियों में श्रेष्ठ, देवियों में श्रेष्ठ हे महासरस्वति! हम अप्रशस्त के समान अर्थात् धनाभावमें असमृद्धवत् हो रहे हैं, अतएव हे माता । हमें प्रशस्ति अर्थात् धनसम्पत्ति प्रदान करो।’। विशेषतया यहाँ सरस्वती को अम्बितमा, नदीतमा तथा देवितमा इन तीन नामोंसे सम्बोधन किया गया है। अतएव तीन भावपूर्ण सम्बोधन जिसमे पहले मातृभाव, दूसरे नदीभाव ओर तीसरे देवीभाव, इन तीन भावों को समझना आवश्यक है। अम्बितमे ‘अम्बा’ शब्दका अर्थ है माता। अगर विस्तार से अम्बितमा शब्द का अर्थ किया जाये तो वह होगा- मातृतमा, अर्थात अखिल विश्व में जितनी मातृशक्तियाँ हैं, सरस्वती सबमें श्रेष्ठ है। मातृभाव किसे कहते हैं? जो रक्षा करती हैं, जो पोषण करती हैं वह माता हैं। माँ सरस्वती जैसी मातृशक्ति दूसरी कोई भी नहीं है, क्योंकि ज्ञानरूप में वे ही सबका पालन करती हो। ज्ञान की अपेक्षा अधिकतर रक्षा करनेवाली शक्ति दूसरे किसी में नहीं है। ज्ञान ही जीवन है और अज्ञान ही नाश है।
ऋग्वेद के 1.3.11 वें सूक्त में दिये अनुसार कि- चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्, यज्ञं दधे सरस्वती॥ सरस्वती सत्य बोलने की प्रेरणा देने वाली हैं तथा उत्तम बुद्धि देवे वाली व लोगों को शिक्षा देने वाली देवी के अलावा नदी रूप मे भी है। नदीतमे का अर्थ है जितनी नदियाँ हैं, उनमें तुम्हीं अर्थात सरस्वती नदी ही श्रेष्ठ है। नदीरूपा सरस्वती का आधिभौतिक भाव जलरूपा सरस्वती नदी है, जो प्रयागराज में गंगा और यमुना के साथ मिलती है जिसे त्रिवेणी संगम कहते हैं। यह आधिभौतिक त्रिवेणी और आधिभौतिकू तीथों में श्रेष्ठ है। नदीरूपा सरस्वतीका आध्यात्मिक भाव सुषुम्णा नाड़ी है, जो इडा और पिङ्गला के मध्यभाग में अवस्थान करती है तथा मूलाधार में दोनोंके साथ युक्त है। यह आध्यात्मिक त्रिवेणी है। ‘नदी’ शब्द का अर्थ क्या है। ‘नद’ घातुका अर्थ है शब्द करना’ । जहाँ गति है, वहाँ शब्द है। ‘नदी’ शब्द के उच्चारण से पर्वतादि से निकलकर अन्त में समुद्र में या अन्य किसी बड़ी नदी में मिलनेवाली सरिताओं का ही बोध होता है। यहाँ ‘नदीतमा’ शब्द के द्वारा नादयिशिष्टा, चलनात्मिका शब्दब्रह्ममयी ही विशेषतः लक्षित होती हैं। नदी का जो आश्रय ग्रहण करता है वह अन्तमें समुद्र में जा पहुँचता है। उसी प्रकार जो शब्दब्रह्म (वेद) का आश्रय लेता है, वह अन्त में परब्रह्म को प्राप्त होता है।
यह श्लोक माँ सरस्वती के तीनों स्वरूप की भावव्यक्ति है जिसमें तीसरे रूप में देवितमे शब्द का प्रयोग है जिसका अर्थ है हे देवी सरस्वती देवियों के मध्य आप ही श्रेष्ठ हो। आप उज्ज्यल हो, ज्योतिर्मयी हो, ब्रह्मस्वरूपा हो। आपको ब्रह्मरूप में जो ध्यान कर सकता है, यही आपको यथार्थरूप से जान सकता है। दिव् घातुका अर्थ है ज्योति, प्रकाश, आलोक। अन्धकार दूर करके आलोक प्रदान करनेवाली जितनी शक्तियाँ जगत में हैं, उन सबमें माँ सरस्वती आप श्रेष्ठ हो। सरस्वति से ‘सरस्’ पद सिद्ध होता है। ‘सरसू’ जिनका है, जो ‘सरस्’ की अधिष्ठात्री देवी हैं, वही सरस्वती हैं। जिससे समस्त गतियाँ प्रवर्तित होती हैं, सत्र आलोक प्रकाशित होता है, अज्ञान दूर होता है, ज्ञान का विकास होता है, यह सरस्वती है। गद्य-पद्यादिरूप में जगत् में जिसके वाक् वा शब्द का प्रसारण होता है, वही सरस्वती है। जहाँ छन्द है, यही गति सरस्वती का रूप है। जहाँ छन्द नहीं, वह अज्ञानका रूप है।
सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।
यही सरस्वती मातृरूप में, नदीरूप में तथा देवतारूप में नित्य हमारी बुद्धि का विषय बन रही है। यही मातृश्रेष्ठा सरस्वती वाग्देवी हैं। वाक्य की देवता हैं तथा शब्दब्रह्मात्मिका मातृकास्वरूपिणी हैं। ब्रह्मज्ञान भी यही हैं। वह परमार्थतः ब्रह्मस्वरूपिणी चिन्मयी हैं। यह नदी- अखिल जगत नादस्वरूपिणी हैं। जो परमाणुओं का स्पन्दन है, बह भी उन्हीं की क्रिया है। वायुका स्पन्दन भी उन्हीं की क्रिया है; वह जगत् के अन्तर्बाह्य स्थित होकर ज्ञान देती हैं। अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि- धनके अभाव से ही मनुष्य संकुचित होता है। ज्ञानधन, विधाधन इत्यादिके अभाव से हम संकीर्ण, शीर्ण हो गये हैं। प्रकाश का जहाँ अभाव है, यहीं संकोच है; गति जहाँ स्वच्छन्द प्रवाहित नहीं होती, वहीं संकोच अवरोध-अन्धकार-दुःख है। ज्ञेय के स्वरूप को जानने के लिये हमारे मार्गमें जो बाधा है, उसे कौन दूर करेगा ? माँ सरस्वती तुम ही दूर कर सकती हो। जो सत्-चित् और आनन्द की प्रसारणी शक्ति है, वह सरस्वती आप है। माँ आप हमारे प्रसारण की बाधा को दूरकर के, हमारे अभाव को मिटा करके, सम्यक् प्रकाश प्रदान करके हमें समृद्धि प्रदान करो। हमें जिसकी आवश्यकता है, जिससे हम प्रशस्त हो सकते हैं, विशालता प्राप्त कर सकते हैं तुम बही हमें प्रदान करो ।) यहाँ सरस्वती के नदी स्वरूप का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है कि- इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः. पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः॥ सरस्वती अपने बलों एवं महान् लहरों द्वारा किनारे के पहाड़ों की चोटियों को इस प्रकार तोड़ती हैं, जिस प्रकार कमल की जड़ खोदने वाला कीचड़ को बिखेर देता है। लगता है वेदों कि रचना के समय सरस्वती नदी का यह स्वरूप रहा होगा किन्तु आज नदी के रूप में उनके दर्शन दुर्लभ है।
‘ब्रह्म’ का अर्थ बृहद् है। अपरिच्छिन्नता ही हमारी सहज अवस्था है, अपरिच्छिन्नता प्राप्त करना ही पूर्ण सुख है। जिस शक्तिदिवस पर हम परिच्छिन्न होते हैं, वह माया या अविद्या है । हम जो अल्प देशव्यापी बने रहते हैं, अज्ञानाच्छादित हुए रहते हैं, निरानन्द रहते हैं, इसका कारण माया या अविद्या ही है। इसलिये बिद्याके द्वारा हमारे परिच्छेदको दूर कर दो; हमारे अभाव, मलिनता, अबिद्या तिरोहित हो, हमें सच विषयोंमें व्यापक कर दो। हमारा चित् प्रसारित हो, हमारा आनन्द प्रसारित हो। आत्मा जिस परिमाण में अप्रशस्त रहता है, उसी परिमाण में वह ब्रह्मभाष से दूर रहता है। सरस्वती ही है जो इस प्रसारण की बाधा दूर कर देती है । अखिल जगत में जो कुछ है सब नाद या शब्द से ही हुआ है; अतएव वाक्य की जो अधिष्ठात्री देवता है, यह सबके लिये उपास्य है। इसी कारण ब्रह्मा, शंकर प्रभृति सभी देवताओं ने माँ सरस्वती की उपासना करके ही विद्यालाभ किया था। यही कारण है कि तीनों लोकों में माँ सरस्विती का डंका बजता है देखे श्लोक- अन्तर्याग्यात्मना विश्वं त्रैलोक्यं या नियच्छति । रुद्रादित्यादिरुपस्था यस्यामा वेश्य तां पुनः । ध्यायन्ति सर्वरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥ अर्थात् अन्तर्यामिनी रूप से जो त्रैलोक्य का नियमन करती हैं अर्थात् महत्व से लेकर परमाणु पर्यन्त पदार्थमात्र जिसकी प्रेरणाके अनुसार कार्य करते हैं; वे चाहे रुद्र हो, आदित्य हो, देवता हो, या हम आप वे सभी के मध्य में अधिष्ठित रहती हैं; जिनसे आविष्ट होकर ही रुद्रादि देवगण सब कर्म किया करते हैं, जिनका ध्यान करके सब कार्य सम्पादन करते रहते हैं।
नामरूपात्मकं सर्व यस्यामावेश्य तां पुनः । ध्यायन्ति प्रह्मरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥ अखिल जगत में जितने नाम, जितने रूप हैं, सब उसके ही नाम, उसके ही रूप हैं; वही नाम-रूपमें विवर्तित होकर अखिल जगत् के आकार को धारण करती है। नाम-रूप उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है, वह उसका मायापरिच्छिन्न रूप है। उसके स्वरूपके दर्शनाभिलाषी योगीजन समाधि- योगमें इसे नाम-रूपको करके प्रकृत रूपका ध्यान करते हैं वह ब्रह्मरूपा सरस्वती देवी हमारा पालन करें। माँ का यथार्थ स्वरूप हृदयगम करने के लिये उपर्युक्त विधि से समाधियोग का अवलम्बन करने से हमारे चित्तक्षेत्र की अप्रशस्तता दूर न होगी, हम देवितमाका स्वरूप याथातथ्येन उपलब्ध न कर सकेंगे। माँ विश्वकी गुरु- स्वरूपिणी है। माँ चिद्रूपा ब्रह्मस्वरूपिणी है। ज्ञानमय परमात्मा के सिवाय ज्ञान देनेकी शक्ति और किसी में भी नहीं है। माँ ब्रह्मादि की भी गुरु है। वाणीं नमामि मनसा बचसा विभूस्यै ॥अर्थात् विद्यासिद्धि के लिये विभूतिया/साधक अपने मन और वचनके द्वारा वाणी देबीको नमस्कार करते है। या बेदान्तार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः । नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥ अर्थात् जो परमार्थतः बेदान्तप्रतिपादित तत्त्वस्वरूपा है- जिनका प्रकृत स्वरूप एकमात्र वेदान्तद्वारा ही जाना जाता है जो ब्रह्मस्वरूपिणी हैं, जो अव्यक्तावस्था में अवस्थान करती हैं एवं जो पुनः नामरूपद्वारा व्यक्तावस्था को प्राप्त होती हैं, यही सरस्वती हमारी रक्षा करें ।
ॐ प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनाम- -विश्यवतु ॥ अर्थात् जो दानादि गुणसे युक्त हैं, जो अन्न-यज्ञकी अधिष्ठात्री देवता हैं- जो अन्नदात्री हैं, जो अपने शरणागत उपासकों की रक्षा करनेवाली हैं, वह सरस्वती देवी अन्न- प्रदानके द्वारा हमारी विशेषरूपसे रक्षा करें, हमारे लिये तृप्ति प्रदान करें। या साङ्गोपाङ्गवेदेषु चतुष्वेंकैव गीयते । अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती॥ अर्थात् अंग और उपांग सहित ऋग्वेदादि चतुर्वेद एकमात्र जिसकी स्तुति करते हैं, वही अद्वैता ब्रह्म की शक्ति सरस्वती हमारा पालन करें । हीं आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम्। हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती ऋणोतु ॥ भावार्थ यह है कि माँ ब्रह्मरूपिणी, चिद्रूपा, सर्व- व्यापिनी हैं और हमारे लिये अलक्ष्या हैं। माँ की सूक्ष्म अव्यक्त अवस्थाएँ मध्यमा, पश्यन्ती प्रभृति भी हमारे लिये अनभिगम्य हैं। माँ हमारे ऊपर कृपा करके अपने अव्यक्त सूक्ष्मावस्था से व्यक्तरूप में हमारे यज्ञ पूजा की सिद्धिके लिये आविर्भूत होवे वही यज्ञ की प्रवृत्तिका हैं, वही यज्ञ करने की प्रवृत्ति प्रदान करती हैं, वही उपकरण रूप में, बही इसकी अधिष्ठात्री देवी के रूप में तथा बही फलरूपमें आविर्भूत होती हैं। हम उनकी अधम सन्तान हैं, हमारी इस स्तुतिको वह कृपापूर्वक सादर सन्तान-निवेदित समझकर इसीके द्वारा ग्रहण करें तथा प्रसन्न होवें । देवी सरस्वती पूर्णा हैं, उसे किसी के पास से कुछ ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है, किसी की स्तुति सुनने की भी उन्हें अपेक्षा नहीं है। किन्तु हम उनकी सन्तान हैं, सन्तान दीन-दरिद्र होते हुए भी अकपटभाव से, भक्ति के साथ जो अर्पण करता है, जो स्तवन करता है, उसे ग्रहण करने के लिये, उसे श्रवण करने के लिये स्नेहमयी जननी उत्सुक हो जाती हैं। इसीलिये हम प्रार्थना करते हैं कि यह हमारे इस आह्वान को सुनें और हमारे लिये हमारा अभीष्ट प्रदान करें, जो वे सदैव करती आई है।
या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेणैव अनादिनिधनानन्ता सा मां पातु वर्तते सरस्वती ॥ अर्थात् जो वर्ण, पद, वाक्य तथा अर्थरूप में विद्यमान हैं, जो अनादिनिधना तथा अनन्ता हैं यह सरस्वती देवी हमारा पालन करें। श्रीं पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धिया वसुः॥ ऋग्वेद1/3/10 भावार्थ देवी सरस्वती पवित्र करने वाली तथा अन्न एव धन देवे वाली है वे धन लेकर यज्ञ मे आए। सरस्वती देवी हमारी यज्ञ-कामना करें। क्योंकि उनकी इच्छा या प्रेरणाके बिना कोई कर्म प्रवर्तित नहीं हो सकता। सर्वशक्तिमती माँ सरस्वती की शक्तिके बिना किसी का भी निर्वाह नहीं होता। हमें प्रचुर अन्न या धन की कामना की पूर्ति अन्न यज्ञ की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती पूर्ण करती हैं जिससे हम अन्नदान करने में समर्थ होते हैं। माँ सर्वाभीष्टप्रदा हैं; वह सबकी अभीष्टसिद्धि करती तो हैं, परन्तु उसके लिये कर्म करना होता है। यही उनका नियम है। कर्म तो हम करेंगे; परन्तु प्रवृत्ति के बिना कर्म होता नहीं, हमारी शुभकर्म में सहज प्रवृत्ति होती नहीं, यह प्रवृत्ति का भाव भी माँ सरस्वती ही प्रदान करती है जिससे हम उनसे प्रार्थना करते है ओर वह हमारी यज्ञ-कामना पूर्ण कर कर्म करने की शक्ति भी जाग्रत करती है ताकि हम सभी के सब दुःखों की निवृत्ति हो। ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती यश की व वेदोक्त कर्म की भी अधिष्ठात्री देवि हैं, जो सदैव हम लोगों के भीतर-बाहर रहकर हम लोगों को परम कल्याण-मार्ग में- यथार्थ सुख के पथमें प्रवर्तित और संचालित करती हैं।
सरस्वती का महात्म्य अवर्णीय है किन्तु ऋग्वेद के अध्ययन के बाद उन्हे स्मरण कर लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। अध्यात्ममधिदैवञ्च देवानां सम्यगीश्वरी । प्रत्यगास्ते वदन्ती या सा मां पातु सरस्वती॥ अर्थात् जो देवताओं का अध्यात्म और अधिदैव हैं- जो देवताओंको आध्यात्मिकी शक्ति हैं और आधिदैविकी शक्ति हैं, वे सब देवताओं अथवा शक्तियों को अन्तर्यामी रूप से प्रेरण करती हैं वही सरस्वती देवी हम सबका पालन भी करती है। माँ सरावती की कृपा से ही वाणी एसजे प्रयोग करते समय हम सुकृत शब्दों वाक्यों का प्रयोग उनकी दी गई चेतना से कर पाते है। ऋग्वेद में कहा गया है कि – सौः महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयत्ति केतुना । धियो विश्वा विराजति ॥ वेदमें आकाशको समुद्र कहा गया है, आकाश में ही वस्तुतः सब शक्तियाँ निहित हैं, आकाश ही सब शक्तिका आधार है। ‘अर्णः’ पदका अर्थ यहाँ आकाश है, उसका स्पन्दन ही क्रमशः वायु, जल प्रभृति स्थूल अवस्था को प्राप्त होता है, तथा बही विलोम क्रिया से पुनः आकाश में विलीन हो जाता है तथा वेदरूप में अवस्थित होता है। पूजा करते समय यह क्रिया मानसिक भाषा से करनी होती है, परब्रह्वा से किस प्रकार प्रकृति क्रमशः स्थूल, स्थूलतर तथा स्थूलतम अवस्थाको प्राप्त होती है, तथा पुनः किस प्रकार उस अवस्थाको प्रत्यावर्तन करती है, इसका विचार करना पड़ता है, यह जो स्पन्दन की बात कही गयी है,वह केवल जड-स्पन्दन नहीं है, बल्कि चैतन्ययुक्त स्पन्दन है, यही सरस्वती का रूप है। यह ज्ञानमयी – चित्स्वरूपा हैं। विश्व की जो ज्ञानशक्ति है, वही सरस्वती हैं।
सरस्वती ज्ञानस्वरूपा और सर्वव्यापिनी हैं, किन्तु जीव साधारण अवस्थामें उनके सत्त्वका अनुभव नहीं कर सकता । जीव जब प्रत्यदृष्टि होता है अर्थात् बहिर्मुख- अवस्थाका त्याग करके अन्तर्मुख होता है तभी उसके हृदय- में सरस्वती प्रतिभात होती हैं। तभी वह माँ की उपलब्धि कर सकता है। वह व्यापिनी चिन्मात्रस्वरूपी सरस्वती सबका पालन कर सबको विषयों में प्रकाश प्रदान करती है। सरस्वती कि अवस्थाओं के विषय में ऋग्वेद कहता है कि- या प्रत्यगृहष्टिभिर्जीवै व्यज्यमानानुभूयते । व्यापिनी शतिरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥ -ऐं चत्वारि वाकू परिमिता पदानि तानि विदुर्गाहाणा ये मनीषिणः । गुहा श्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ -वाक् की शब्द व वेदरूपा सरस्वती की चार अवस्थाएँ हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । इनमें तीन अवस्थाएँ गुहानिहित हैं अर्थात् सर्वसाधारणके देखने- में नहीं आतीं, न जानने में आती हैं। उन्हें ब्राह्मण ही जान सकते हैं। सभी ब्राह्मण नहीं जान सकते । जो मनीषी हैं, योगी हैं वे दिव्यदृष्टि द्वारा शब्द की उन सब अवस्थाओं को प्रत्यक्ष करते हैं। मनुष्य जिस वाक्यका व्यवहार करते हैं वह वाक्की तृतीय या चतुर्थ अर्थात् बेखरी अवस्था है। या विकल्पिता । नामजात्यादिभिर्भे दै रष्टधा निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती॥ ऊर्जा बुदुहे पयांसि क स्विदस्याः परमं जगाय ।। भावार्थ- ‘वाक् विश्वव्यापिनी है। ‘वाक्’ द्वारा ही विकल्प – विविध भाव की कल्पना होती रहती है। नाम, जाति प्रभृति भेदद्वारा विकल्पित जो माँ का स्वरूप है वह प्रकृत स्वरूप नहीं है। निर्विकल्प आत्मा में माँ का जो स्वरूप प्रकाशित होता है वही माँ का यथार्थ स्वरूप है। योगी लोग निर्विकल्प समाधिके द्वारा माँके यथार्थ स्वरूप को जानते हैं। माँ का निर्विकल्प आत्मा में जो प्रकाश या अभिव्यक्ति होती हैं उसकी उपलब्धि स्वयं निर्विकल्प हुए बिना नहीं हो सकती।
वाणी का प्रयोग सभी करते है, भूत प्रेत, जीव जन्तु व पशु सबकी अपनी भाषा होती है। जो विचेतन हैं वे भी वाणी का वाग्व्यवहार करते हैं। इस ‘वाक्’ का प्रेरक कौन है? सरस्वती। वही अचेतन जड पदार्थों- को वाक्-युक्त करती हैं, वही देवताओं के अन्तर में वाक् की प्रेरणा करती हैं। एक परमाणु जो अनेकों परमाणुओं में एक निर्दिष्ट परमाणुको आकर्षण करता है, यह सरस्वतीकी ही प्रेरणा है। वह ‘वाक्’ रूपसे उसमें भी अधिष्ठित हैं। उनकी प्रेरणाके अनुसरणमें ही यह जान सकता है कि ‘यह हमारा है’, इसी कारण यह उस विशिष्ट परमाणु को ही आकर्षण करता है। देवताओं,देवीओ, लेखकों,विचारको ओर कवियों आदि की भी वही नायिका हैं। कर्मशील जगत्, व्यक्त अखिल विश्व माँ का ही रूप है माँ का ही वैखरी रूप है। माँ की ही प्रेरणामें सब कर्म करते हैं। कहा भी गया है कि-व्यक्ताव्यक्तगिरः सर्वे वेदाद्या व्याहरन्ति याम् । सर्वकामदुधा धेनुः सा मां पातु सरस्वती ॥ अर्थात् व्यक्त, अव्यक्त, शब्दात्मक वेदादि शास्त्र जिसके स्वरूपका गान करते हैं, जिसके विस्तृत रूपका वर्णन करते हैं, वह सर्वकामधुघा धेनुरूपा सरस्वती हमारा पालन करती है। ‘व्यक्त’ शब्द द्वारा वैखरी और अव्यक्त शब्दद्वारा परा, पश्यन्ती और मध्यमा वाक्य लक्षित होते हैं। जो चिन्ता- शक्ति है, वह भी वेद है। वह अव्यक्त वेद है। जीवों के हृदय में धर्म-अधर्म, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का निर्देश करती हैं, वही वारूपिणी सरस्वती जिसका बल अनंत, अपराजित, दीप्तियुक्त, गतिशील एवं जलसहित है तथा बार- बार शब्द करता हुआ पाताल में घूमता है वह सरस्वती जिसकी स्तुति वेदों में इस प्रकार है कि माँ सरस्वती हमें सभी शत्रुओं से छुटकारा दिलाये ओर लिखने पढ़ने में साँसों के चलने तक हमारी सहायता कर निंदकों से हमारी रक्षा करें तथा हमें प्रसिद्ध धन के पास ले चलो. हमारी अवनति मत करो. हमें जलद्वारा पीड़ा न पहुंचाओ. हमारे मैत्रीकार्यों और प्रवेशों को स्वीकार करो., यही प्रार्थना मेरी भी है।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
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