गुलाल की कहानी की शुरुआत हुई साल 2001 में। उस वक्त अनुराग कश्यप जीवन के ऐसे पड़ाव पर थे जब उन्हें हर चीज़ पर गुस्सा आता था। उन्होंने कहा कि उस साल सेंसर बोर्ड ने उनकी फिल्म को पांच सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था और उन्हें महसूस हुआ कि वे हर चीज़ से नाराज हैं-चाहे वह नए राज्य बनना हो या प्यार में पड़ने की घटनाएं। इसी गुस्से और असंतोष ने उन्हें गुलाल बनाने की प्रेरणा दी।फिल्म की कहानी उन्हें तब मिली जब अभिनेता पंकज सारस्वत ने उन्हें राजा चौधरी से मिलवाया। राजा ने कॉलेज पॉलिटिक्स पर लिखी एक कहानी साझा की जिसे अनुराग ने पृष्ठभूमि देने का निर्णय लिया। इसके लिए वे जयपुर गए और वहां कई राजपरिवारों के सदस्यों से मुलाकात की। इन मुलाकातों ने फिल्म की कहानी को वास्तविकता और इतिहास से जोड़ने में मदद की।
गुलाल की रिसर्च में अनुराग कश्यप ने इतिहासकार शारदा द्विवेदी रोमिला थापर और कई अन्य लेखकों के लेख पढ़े। उन्होंने भारत गणराज्य में राजपूतों की भूमिका और पटियाला रिपोर्ट जैसी ऐतिहासिक जानकारियों को फिल्म की कहानी में समाहित किया। इस तरह फिल्म की पटकथा तैयार हुई।फिल्म का संगीत भी खास रहा। जब अनुराग कश्यप फिल्म लिख रहे थे तब पीयूष मिश्रा ने संगीत की दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। उन्होंने फिल्म के लिए ऐसे गाने लिखे जो आज भी याद किए जाते हैं। शुरुआत में प्रोड्यूसर नहीं मिलने की वजह से फिल्म का निर्माण अटक गया लेकिन बाद में जी मोशन पिक्चर्स ने फिल्म को उठाया और आखिरकार यह रिलीज हो सकी।
गुलाल बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही लेकिन इसके बावजूद इसने दर्शकों के बीच कल्ट फिल्म का दर्जा पा लिया। इसकी कहानी राजनीति और संगीत आज भी फिल्म प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। IMDb पर इस फिल्म को 8 रेटिंग मिली है जो इसे और भी खास बनाती है।गुलाल सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि अनुराग कश्यप के गुस्से शोध और जुनून का परिणाम है। 8 साल की मेहनत और सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर तीव्र नजर ने इसे भारतीय सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया।
