अमेरिकी राजनयिक के बयान से बढ़ा विवाद
द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 दिसंबर 2025 को ढाका में एक अमेरिकी राजनयिक ने बांग्लादेशी पत्रकारों के साथ एक ऑफ-द-रिकॉर्ड बैठक की थी। इस बैठक की रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश की राजनीति इस्लामिक विचारधारा की ओर झुक रही है और उन्होंने मीडिया को जमात की छात्र शाखा इस्लामी छात्र शिविर के नेताओं को मंच देने की सलाह दी।
राजनयिक ने यह भी कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात के नेता उसके साथ मित्रवत संबंध रखें, क्योंकि पार्टी अब इतनी मजबूत हो चुकी है कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, बाद में अमेरिकी दूतावास ने सफाई दी कि अमेरिका किसी एक दल का समर्थन नहीं करता।
जमात की बढ़ती ताकत
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और उनके भारत जाने के बाद जमात-ए-इस्लामी तेजी से उभरी है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के तहत हो रहे चुनावों में जमात के अब तक के सबसे अच्छे प्रदर्शन की संभावना जताई जा रही है।
अमेरिका स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट IRI के दिसंबर सर्वे के अनुसार, 53 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने जमात-ए-इस्लामी को समर्थन दिया है। विश्वविद्यालयों में हुए छात्र संघ चुनावों में भी जमात की छात्र इकाई की जीत ने उसकी मजबूत जमीनी पकड़ को दिखाया है।
अमेरिका की गाजर और छड़ी नीति
अमेरिका जहां जमात से संवाद बढ़ा रहा है, वहीं उसने सख्त चेतावनी भी दी है। अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि यदि जमात सत्ता में आकर शरिया कानून लागू करती है या महिलाओं की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाती है, तो अमेरिका कड़े आर्थिक कदम उठाएगा, जिसमें 100 प्रतिशत टैरिफ तक शामिल हो सकता है। अमेरिका बांग्लादेश का बड़ा व्यापारिक साझेदार है और उसके कुल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत अमेरिकी बाजार में जाता है।
जमात की बदली हुई छवि
1971 के मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का समर्थन करने के कारण लंबे समय तक प्रतिबंध झेल चुकी जमात अब भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति और सामाजिक कल्याण के मुद्दों को आगे रख रही है। हालांकि, पार्टी के भीतर मतभेद भी सामने आ रहे हैं। हाल ही में इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
भारत की बढ़ती चिंता
भारत के लिए जमात का उभार और अमेरिका द्वारा उसे वैधता मिलना दोहरी चुनौती माना जा रहा है। नई दिल्ली जमात को उसकी ऐतिहासिक भूमिका और पाकिस्तान से वैचारिक नजदीकी के कारण संदेह की नजर से देखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका संबंधों में अतिरिक्त तनाव पैदा कर सकता है।
शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं और अवामी लीग समर्थकों पर हमलों की खबरें भी बढ़ी हैं। पूर्व विदेश मंत्री ए.के. अब्दुल मोमेन ने आरोप लगाया है कि मौजूदा प्रशासन के दौरान अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है और समाज में नफरत का माहौल बनाया जा रहा है।
