
भला इस संसार वनाने का क्या काम था? व्यर्थ इतने उल्लू एक संग पिंजड़े में बन्द कर दिए किसी को दुःखी बनाया किसी का सुखी, किसी को राजा बनाया किसी को फकीर, इसी से मैं कहता हूं कि ईश्वर बड़ा विलक्षण है।
सब उस में लय रहता, किसी को कुछ दुःख सुख का अनुभव न होता, वह केवल परम आनन्दमय अपने में रहता इसी से-
कोई इस को हां कहता हे कोई नहीं, कोई मिला कांई अलग, कोई एक कोई अनेक तो उस को अपने माहात्म्य की दुर्दशा क्यों करानी थी इसी से-
सर्व्व सामर्थ्य मान उस को सुन कर भी लोग मर्व्वदा उस को नहीं मानते पर हां जब कुछ दुःख पड़ता है तब स्मरण करते हैं। जब लोगों का कुछ बनता है तो उस को धन्यवाद तो थोड़े लोग देते हैं पर जो कुछ काम विगड़ता है तो गाली सभी देते हैं, पानी न वरसे तो, घर का कोई मर जाय तो, रोग फैले तो, हार जांय तो सब प्रकार से वह गाली सुनता है इसी से-
अनेक प्रकार के जीव, विचित्र स्वभाव, अलग अलग धर्म और रुचि, विचित्र विचित्र रंग काम, क्रोध, मद, ईर्षा, अभिमान, दम्म, पैशुन्य, आनृत्य इत्यादि अनेक प्रकार के स्वभाव बना कर लम्बा नोड़ा गोरख धंधा का जाल फैला कर इस घनचक्कर में सब को घुमा दिया है इसी से-
एक बिचारा सुख से अपना काल क्षेप करता है कुछ उस के काम में विघ्न डाल कर व्यर्थ बिना बात बेठे विठाये उस को रुला दिया, कोई दुःख में है उस को एक संग सुख दे दिया इसी से-
एक को घटाया एक को बढ़ाया, एक को बनाया एक को बिगाड़ा, राई को पर्वत किया पर्वत को राई, राजा का रंक किया रंक को राजा, भरी ढलकाया खाली भरा इसी से-
उदार और पंडित दरिद्र मूर्ख धनवान और सुन्दर रसिक को कुरूपा कूढ़ स्त्री, कुरसिक को सुन्दर वा रसिक स्त्री, सुस्वामी को कुसेवक, कुसेवक को सुस्वामी इत्यादि संसार में कई बातें बेजोड़ हैं इसी से-
प्रत्यक्ष लोग देखते हैं कि हमारे बाप दादा इत्यादि मर गए और नित्य लोग मरते जाते हैं तब भी जो लोग जीते हैं जानते हैं कि संसार का पट्टा मैंने लिखया लिया है पहिले तो मैं मरूपिंगा नहीं और मरा भी तो सब मेरे साथ जायेगा इसी से-
सच है मनुष्य यह कैसे सोचै, जो हम बैठे हैं, खाते पीते हैं, चैन करते हैं कभी सोचते नहीं कि हमारी दशान्तर भी होगी वही हम कैसे मरेंगे कदापित नहीं आता इसी से-
मजा है तमाशा है खेल है धूम है, दिल्लगी है मसखरापन है, लुच्यापन है, हंसी है, मूर्खता है, खिलौने हैं, बालक हैं, पट्टे हैं, नासमझ है, जड़ हैं मोहित हैं, उल्लू के पट्ठे हैं, सव परन्तु उस के समझ में और उस के लोगों के समझ में भेद हे इसी से-
उस के नाते परस्पर सब केवल सगे भाई बहन हैं पर लोग जाति कुजाति वर्ण आश्रम नीचे ऊंच राजा प्रजा स्त्री पुत्र इत्यादि अनेक भेद समझते हैं इसी से-
यह उसी कि विलक्षणपन है कि हिन्दुओं को सब के पहिले उस ने लक्ष्मी और सरस्वती दी और चिर काल तक उन को इस देश में स्थित किया परन्तु अब वह हिन्दू दास धर्म शिक्षित हो रहे हैं इसी से-
यह उसी का विलक्षणपन है जिस भूमि में उदयन, शूद्रक, विक्रम, भोज ऐसे राजा कालीदास, वाण से पंडित दे उसी भूमि में हमारे तुम्हारे से लोग हैं, यह उसी का विलक्षणपन है कि मुसलमानों ने हिन्दुस्थान को बहुत दिन तक भोगा अव अंगरेज भोगते हैं, मुसलमानों को अपने पक्षपात हैं अंगरेजों को अपनी का, हिन्दू दोनों की समझ में मूर्ख हैं इसी से-
यह उसी का विलक्षणपन है कि हिन्दू निर्लज्ज हो गए हैं, ऐसे समय में जब कि सब आगे बढ़ा चाहते हैं ये चूकते हैं और पीछे ही रहे जाते हैं, विशेष कर के सब संसार का आलस्य पश्चिमोत्तर देश वासियों में घुसा हे ओर अपने को भूल रहे हैं क्षुद्रपना नहीं छूटता इसी से-
यह उसी का विलक्षणपना हे कि हम लोग समाचार पत्र लिखते हैं और यह अभिमान करते हैं कि हमारे इन लेखों से हमारे भाइयों का कुछ उपकार हो, भला नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है, सब अपने रंग में उस की माया से मस्त हैं उन को क्यों नहीं छोड़ते हैं क्यों नहीं विगग करते, संसार मिटे हम को क्या हम कौन जो करें, पर यह नहीं समझते, हम अपने ही अभिमान में चूर हैं यह भी सब उसी की माया है इसी से हम कहते हैं ईश्वर बड़ा विलक्षण है।
[अनुमानित रचनाकाल 1874 से 1878 ई. के बीथ स्तोत्र पंचरत्न खङ्गविलास प्रेस बांकीपुर से पुस्तिकाकार छपा था। इराकी भूमिका भारतेन्दु ने 1882 में लिखी थी। इसकी द्वितीय आवृत्ति 1886 ई. में हुई। इसमें ‘ईश्वर बड़ा विलक्षण है’ लेख शामिल कर लिया गया था। संपा.
