आंकड़ों में मंदी की आहट यूएस कॉन्फ्रेंस बोर्ड द्वारा जनवरी 2026 के लिए जारी किए गए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। उपभोक्ता विश्वास का ग्राफ एक ही महीने में 94.2 फीसदी से गिरकर 84.5 फीसदी पर आ गया है। साल 2014 के बाद यह सबसे निचला स्तर है जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जनता का अपनी अर्थव्यवस्था पर से भरोसा डगमगा रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी नागरिकों में भविष्य की आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताएं लगातार गहरा रही हैं। विशेष रूप से एक्सपेक्टेशन इंडेक्स जो भविष्य की आय और व्यावसायिक स्थितियों का आकलन करता है वह 65.1 पॉइंट पर आ गया है। अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है कि यदि यह सूचकांक 80 से नीचे रहता है तो यह आने वाली भीषण मंदी का स्पष्ट पूर्व-संकेत होता है। ऐसे में ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे नारे अब धरातल पर हवा-हवाई साबित होते दिख रहे हैं।
महंगाई और बेरोजगारी का दोहरा वार अमेरिकी जनता के इस असमंजस के पीछे सबसे बड़ा कारण बेतहाशा बढ़ती महंगाई है। किराने का सामान और रोजमर्रा की जरूरतें इतनी महंगी हो गई हैं कि मध्यम वर्ग की कमर टूट चुकी है। कॉन्फ्रेंस बोर्ड की चीफ इकॉनमिस्ट दाना पीटरसन का कहना है कि सूचकांक के पांचों प्रमुख घटक अपने निचले स्तर पर हैं। वहीं दूसरी ओर लेबर मार्केट की स्थिति भी उत्साहजनक नहीं है। ट्रंप सरकार ने स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने के नाम पर वीजा और इमिग्रेशन नियमों को कड़ा तो किया लेकिन इसका सकारात्मक असर नौकरियों पर नहीं दिखा। दिसंबर 2025 में केवल 50 हजार नई नौकरियां सृजित हुईं जबकि तुलनात्मक रूप से साल 2024 में जहां 20 लाख नौकरियां मिली थीं वहीं 2025 में यह आंकड़ा सिमटकर महज 6 लाख रह गया।
टैरिफ और ट्रेड पॉलिटिक्स का दुष्प्रभाव डोनाल्ड ट्रंप की ट्रेड वॉर और टैरिफ नीतियों ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है जिससे लेबर मार्केट में लो हायर-लो फायर (कम भर्ती कम छंटनी) की स्थिति बन गई है। कंपनियां अनिश्चितता के माहौल में नई नियुक्तियों से बच रही हैं। वर्तमान में अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.4 प्रतिशत है लेकिन रोजगार सृजन की सुस्त रफ्तार ने भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। निष्कर्षतः ट्रंप की आर्थिक नीतियां फिलहाल उनके ही प्रशासन के लिए गले की हड्डी बनती दिख रही हैं जहां दावे तो ट्रिलियन डॉलर के मुनाफे के हैं लेकिन हकीकत में जनता मंदी के साये में जीने को मजबूर है।
