अस्पताल में अब भी जारी है संघर्ष मृतक एकनाथ सूर्यवंशी के परिजनों के अनुसार, वे लगभग 20 से 25 दिनों तक वेंटिलेटर पर रहे। दूषित पानी के सेवन से शुरू हुए उल्टी-दस्त के मामूली दिखने वाले लक्षणों ने धीरे-धीरे उनके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर हमला बोल दिया। संक्रमण इतना घातक था कि उनकी किडनी और लिवर ने काम करना बंद कर दिया, जिससे ‘मल्टी ऑर्गन फेलियर’ की स्थिति बन गई। वर्तमान में भी अस्पताल में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है; दो मरीज अभी भी जीवन रक्षक प्रणाली वेंटिलेटर और आईसीयू पर हैं, जबकि 8-10 अन्य मरीजों का उपचार जारी है।
लापरवाही की गंदी नालियाँ और टूटता भरोसा भागीरथपुरा की यह त्रासदी एक प्रशासनिक चूक का भयावह परिणाम है। यहाँ पेयजल की पाइपलाइनों में सीवर और ड्रेनेज का गंदा पानी रिसकर मिल गया। जिस पानी से लोगों की प्यास बुझनी थी, उसी ने उनके घरों में जहर घोल दिया। देखते ही देखते 450 से अधिक लोग संक्रमण की चपेट में आ गए। शुरुआत में मौतों का आंकड़ा कम था, लेकिन संक्रमण के गहरे जख्मों के कारण अब यह संख्या 31 तक जा पहुँची है। हालांकि निगम अब हाईटेक निगरानी की बातें कर रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों का आक्रोश चरम पर है। उनका कहना है कि जब अपनों को खो दिया, तब प्रशासन की नींद टूटी है।
सियासी तापमान और प्रशासनिक कवायद इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दौरे के बाद अब कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार और निगम प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 3 फरवरी को इंदौर में एक बड़े धरना-प्रदर्शन की चेतावनी दी गई है। दूसरी ओर, नगर निगम आयुक्त और महापौर का दावा है कि प्रभावित क्षेत्र में पानी की आपूर्ति रोक दी गई है और टैंकरों के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुँचाया जा रहा है। सैंपलिंग और टेस्टिंग बढ़ा दी गई है, लेकिन सवाल वही है कि “स्वच्छता के नंबर 1” शहर में ऐसी बुनियादी और घातक चूक हुई ही कैसे यह घटना एक सबक है कि केवल सतही सफाई ही स्वच्छता नहीं है, बल्कि जमीन के नीचे दौड़ती पाइपलाइनों में शुद्धता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
