
राज्य में स्थापित विभिन्न आयोगों का कार्य केवल सरकार को सिफारिश करना होता है जो शिकायतें आपसी सहमति से सुलझ जाए उनका निराकरण करना होता है। किसी भी आयोग को न्यायिक शक्तियां नहीं है कि शिकायतों का फैसला करें। परन्तु चाहे महिला आयोग हो अथवा बाल आयोग वे प्रकरणों के लिए सुनवाई ऐसे करते है जैसे कि कोई न्यायिक मुकदमा चलता है। ये सभी आयोग केवल महिलाओं एवं बच्चों के अधिकारों के संरक्षण की जागरूकता के प्रचार प्रसार के लिए स्थापित है। इनके अध्यक्ष एवं सदस्य भी प्रतिष्ठित समाजसेवी विधिवेत्ता एवं अनुभवी एवं अनुभवी नियुक्त किए जाने चाहिए परन्तु यह देखा गया है कि राजनैतिक कार्यकताओं को नियुक्त कर दिया जाता है जिस कारण आयोग की गरिमा धूमिल होती है। यहीं कारण है कि 27 जनवरी को महिला आयोग में समारोह सा हो गया। जो कि आयोग की प्रतिष्ठा के विपरीत है। महिला उत्पीड़न के प्रकरणों के संबंध में आयोग को अविलम्ब कार्यवाही कर प्रकरण न्यायालय में भेजना चाहिए अथवा सुनवाई कर सरकार की सिफारिश भेजना चाँहिए, परन्तु आयोग की कार्यवाही
इस तरह प्रसारित की जाती है जैसा कि आयोग ही न्यायालय है। महिला आयोग की अध्यक्ष लता वानखेड़े द्वारा आयोग सखी करूण जीके छिब्बर समिति एवं युक्ति समिति बनाना अच्छा कदम है और आयोग का यही मुख्य कार्य है कि किस तरह महिला उत्पीड़न रोका जाए महिलाओं को जागृत किया जाए, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की जाएं। मध्यप्रदेश में महिला उत्पीड़न दहेज एवं यौन उत्पीड़न के विवाद बढ़ रहे हैं वह केवल बेंचे लगाकर कम नहीं होंगे इसके लिए प्रचार प्रसार जागरूकता आवश्यक है शिविर सम्मेलन गोष्ठियां आवश्यक है। सरकार को भी समुचित फण्ड उपलब्ध कराने चाहिए ताकि आयोग महिलाओं के संरक्षण के लिए प्रभावी रूप से कार्य कर सकें। आयोग के सदस्यों को भी दलगत राजनीति से दूर रहकर निःस्वार्थ कार्य करना चाहिए। आयोग संवैधानिक निकाय है राजनैतिक मंच नहीं आशा की जानी चाहिए कि महिला आयोग अपने चास्तविक कार्य को मूर्त रूप देने में सक्रियता से कार्य करेगा
