
भारत एक विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के साथ ही सामरिक दृष्टि से उभरती शक्ति बनता जा रहा है। जिसमें देश की पुरुष और महिला शक्ति दोनों का विशेष योगदान है। जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे में मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया से जुड़ी स्वच्छता को आज भी सामाजिक चुप्पी और उपेक्षा का विषय बनाए रखना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वर्तमान समय में मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार घोषित करना विशेष रूप से छात्राओं के गरिमामयी, स्वस्थ और शिक्षित जीवन के लिए अनिवार्य हो गया है। मासिक धर्म कोई रोग या अपवित्रता नहीं, बल्कि स्त्री शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसके बावजूद समाज में इससे जुड़ी झिझक, शर्म और भेदभाव आज भी मौजूद है। अनेक छात्राएँ पीरियड्स के दौरान स्वच्छ साधनों के अभाव में असुरक्षित कपड़े या अन्य अनुपयुक्त वस्तुएँ प्रयोग करने को मजबूर होती हैं, जिससे संक्रमण और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। यह स्थिति उनके स्वास्थ्य के अधिकार का सीधा उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में निहित है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी मासिक धर्म स्वच्छता की कमी छात्राओं के लिए बड़ी बाधा बनती है। पीरियड्स के समय पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में कई छात्राएँ स्कूल जाने से कतराती हैं, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। कुछ छात्राएँ धीरे-धीरे विद्यालय छोड़ने को विवश हो जाती हैं। यदि मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार का दर्जा मिले, तो विद्यालयों में स्वच्छ शौचालय,मुफ्त सेनेटरी उत्पाद और सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था अनिवार्य होगी, जिससे शिक्षा का अधिकार प्रभावी रूप से सुनिश्चित हो सकेगा। अक्सर देखा गया है कि आज भी बहुत से स्कूल और कॉलेज में बालिकाओं के उपस्थित शत प्रतिशत नहीं हो पाती है इसके पीछे स्वच्छ शौचालय की उपलब्धता बड़ा कारण मान सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर मासिक धर्म के समय शारीरिक पीड़ा और थकान रहती है। आज भी ग्रामीण परिवेश में लड़कियों को मुश्किल से आठवीं के बाद स्कूल बंद करना पड़ता है। इसकी वजह यह नहीं है कि स्कूल और कॉलेज नहीं है, बल्कि मासिक धर्म के दौरान आने वाली परेशानियाँ और समाज में जागरूकता का अभाव है। आज भी समाज में इसे गलत नजरिए से देखा जाता है, जबकि यह प्राकृतिक पदार्थ प्रक्रिया है। इसमें डरने, शर्माने और स्वयं को दोषी समझने की जरूरत नहीं है। यह कोई अपराध नहीं है।
आज का समाज और परिदृश्य बदल चुका है संविधान में जहां बेटे बेटी का फर्क मिटाकर समानता के अधिकार पर जोर दिया है, वही सभी को गौरवपूर्ण जीवन जीने का भी हक दिया है। स्कूल में समुचित शौचालयों की व्यवस्था, स्वच्छ पानी और साबुन उपलब्ध करवाना स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी है। स्कूलो, कॉलेजों में छात्राओं के लिए अलग से पानी के साथ शौचालय के व्यवस्था, और साबुन की व्यवस्था भी सुनिश्चित होनी चाहिए। स्कूल स्तर पर स्वच्छता के प्रति जागरूक होने की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि साफ सफाई कई बीमारियों की रोकथाम भी कर सकती हैं। शासन स्तर पर स्कूलों और कॉलेज के लिए कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए बायो डिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन, फोलिक एसिड की टेबलेट आदि उपलब्ध करवाई जाती है। लेकिन आज भी यह दवाइयां और नैपकिन स्टोर में डंप पड़े रहते हैं और बाद में जला दी जाती है। इनका सही उपयोग करवाना आज अति आवश्यक है।लापरवाही वश बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा बर्बादी की भेंट चढ़ जाता है और इस विषय पर किसी अधिकारी का भी ध्यान नहीं जाता। बहुत से स्कूलों में फर्स्ट एड किट तक नहीं मिलती, जो कि स्कूल प्रबंधन की घोर लापरवाही को दिखाता है। समाज में यह धारणा भी कम हुई है कि पीरियड के दौरान लड़कियां या महिलाये अपवित्र हो जाती हैं। ऐसी धारणा गलत है उन्हें पीरियड दे दौरान काम न करने, किचन में न जाने की सलाह इसलिए दी जाती है ताकि उन्हें आराम मिल सके। इस दौरान उन्होंने देखभाल और आराम की बहुत आवश्यकता होती है। खून बहाव के कारण शरीर में खून की कमी होने से कमजोरी महसूस होती है। यह कोई धार्मिक रूढ़िवादिता या शारीरिक अपवित्रता का विषय नहीं है।
सामाजिक विज्ञान, गृह विज्ञान और जीव विज्ञान जैसे विशेष विषयों में जननांग संबंधी जानकारी, निषेचन, हारमोंस बदलाव, शारीरिक अंगों में बदलाव से संबंधित टॉपिक को स्किप कर दिया जाता है, जो कि युवा छात्र छात्राओं के मानसिक भटकाव,भ्रांतियों की वजह बनते है।छात्राओं को गरिमा मई जीवन जीने का मौलिक अधिकार बने मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार को अनुच्छेद 21 में जोड़ने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की जितनी भी तारीफ की जाए उतनी कम है। डॉ. जय ठाकुर वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया के तहत दायर जनहित याचिका की सुनवाई के बाद जस्टिस जे.बी. पादरी वाला का यह निर्णय एक मील का पत्थर साबित होगा।
मौलिक अधिकार घोषित होने से लैंगिक समानता को भी बल मिलेगा। जब पुरुषों की आवश्यकताओं को सहज रूप से स्वीकार किया जाता है, तो महिलाओं की जैविक आवश्यकताओं की उपेक्षा करना असमानता है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, और मासिक धर्म स्वच्छता इस समानता का महत्वपूर्ण आधार है।
इसके अतिरिक्त, मासिक धर्म स्वच्छता को कानूनी मान्यता मिलने से सामाजिक रूढ़ियों और कुप्रथाओं पर भी प्रहार होगा। जब विद्यालयों और समाज में इस विषय पर खुलकर चर्चा होगी, तो अज्ञान और भय की जगह जागरूकता और सम्मान विकसित होगा। यह बदलाव भावी पीढ़ी को अधिक संवेदनशील और समानतामूलक समाज की ओर ले जाएगा। मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार घोषित करना केवल एक स्वास्थ्य या सुविधा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह छात्राओं की गरिमा, शिक्षा, समानता और मानवाधिकार से जुड़ा विषय है। जब तक देश की बेटियाँ सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानपूर्वक जीवन नहीं जिएँगी, तब तक सशक्त भारत की कल्पना अधूरी रहेगी। अतः समय की माँग है कि मासिक धर्म स्वच्छता को संवैधानिक अधिकार का दर्जा देकर एक न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज का निर्माण किया जाए।
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश
701777083
