
“बड़े होकर क्या बनोगे?” रुआब से जवाब देते है छोटे लड़के -आई. ए .एस., आर्मी आफिसर , इंजीनियर, पायलट , डॉक्टर । एक दिन वास्तव में बड़े होते है वही लड़के और किसी छोटी नौकरी की कम तनख्वाह में से घर भी पैसे भेजने लगते है । ये साधारण लड़के प्रेमिका को डायमंड रिंग नही दे सकते , महंगी काफी नही पीला सकते । सामान्य शक्ल वाले ये लड़के जानने लगते है कि तबियत से उछाला हर पत्थर आसमान में सुराख नही करता । इन लड़कों को अक्सर सड़क पर ड्रीम कार के बाजू से गुजरने पर याद आता है कि इस मॉडल का कौन सा रंग लूँगा तक बचपन में सोच रखा था ।आज सैलरी से बड़ी कठिनाई से बाइक की किश्त कट रही है।
मध्यमवर्गीय परिवार की सामान्य शक्ल वाली साँवली लड़कियाँ रिश्तें के लिये लड़के वालों के घर भेजी गई तस्वीर के वापस आ जाने के बाद जानने लगती है कि उसे महलों का राजकुमार पसन्द नही करेगा । वो मॉल के महंगे कपड़ों की नकल शनिचरी बाज़ार में ढूंढकर अपने शौक पूरे करती है ।
बचपन की खूबसूरत कल्पनाओं का हमेशा के लिये पिंडदान कर दिया जाता है । हर आदमी एक उम्र के बाद कुछ ख्वाबों को अगले जन्म के लिए सौंप देता है।कितने लोग बिना जिये ही खामोशी से उम्र जाया करते हुए इसके खत्म होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे है। इस दुनिया के कैदखाने से आज़ाद होने की प्रतीक्षा है उन्हें।
बहुत मजबूर होकर जब किसी ख़्वाहिश को भुलाया जाता है तो दिल और दिमाग में खाली हुई विशाल जगह को घेरने अवसाद, उदासी और बेज़ारी पसरती है ।
खुद के जीवन के इकलौते ख्वाब को दूसरों के भाग्य में सहज ही उपलब्ध देखना पीड़ादायक है ।ये विसंगतियाँ जीवन के प्रति मोह खत्म करती है। कई बार परिस्थितया फंदे की तरह जकड़ लेती है जिससे रिहाई की राह ही नही होती।
किसी अज़ीज रिश्तें से बिछड़ने के बाद जैसे आती जाती साँस भी बोझ हो जाती है। क्या औसत शक्ल के असफल लोगों की मामूली कहानी बेमज़ा होती है ?
माँ-बाप के संघर्षों की गाथा में पोथियाँ भर दी गयी मगर बच्चों ने खामोशी से जो त्याग किये वह कही दर्ज नही होते ? जबकि मर्जी का जी लेना ही उनका सबसे बड़ा ख्वाब था ।”फिर मिलोगी?” यह उपन्यास वसुधा और आशीष के प्रेम में भीगी , माँ-बाप के लिहाज में पगी और जिम्मेदारी के बोझ में दबी है । वसुधा, पूनम , आनंद, आशीष , शैंकी और सना को पाठकों का मिल रहा स्नेह बताता है कि इन चरित्रों में वे खुद को देखते है।
“फिर मिलोगी ?” मैं इसलिए लिख पाई क्योकि मुझे लाइम लाइट के बाहर के धूमिल घेरे अधिक आकृष्ट करते है। फोकस लाइट के बाहर के अंधेरों को टटोलने पर मालूम होता है कि कुछ कहानियाँ तो वहाँ भी चल रही है ।मैं फ़िल्म देखते वक्त भी हीरो के पीछे भीड़ में खड़े बेनाम चेहरों को देखती हूँ । टी.वी. पर आती किसी ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की फिल्म के मुख्य दृश्य से बहुत पीछे साइकल में जाता बच्चा अब वृद्ध हो चुका होगा , ऐसा सोचती हूँ । राजकपूर के ज़माने की ये बेपता इमारत अब तो खंडहर हो चुकी होगी। दूर नज़र आ रहा गुलमोहर का पेड़ अब तो कट भी चुका होगा । ये वीरान जगह बिल्कुल ऐसी नही होगी ।
“फिर मिलोगी?” बेहद मामूली लोगों की गैर मामूली यात्रा है । मुनाफे को स्वेच्छा से छोड़कर उन घाटों ब्यौरा है जो परिवार और समाज में बने रहने के लिए उठाये जाते है । जमीन पर किरचा-किरचा बिखरी हसरतों के नाम जिन्हें किसी ने एक बार पलटकर नही देखा । उन हताशाओं का बयान है जिन्हें ढांढस नही मिला ।चिन्हित किया गया है उन फीकी मुस्कानों को जिनके पीछे के दर्द को कोई ताड़ ना पाया ।
हारे हुए लोगों के लिए हर बार सांत्वना पुरस्कार नही होता है। घर भर में कोई नही समझ पाता कि चैनल बदलते घण्टों से चुप बैठा लड़का टीवी नही देख रहा बल्कि खुद से भाग रहा है । दुनिया बेखबर है कि रसोई में खामोशी से काम करती वो लड़की एक बेनतीजा कहानी की किरदार है । जिन घरों में जवानों की तस्वीर पर माला टंगी हो वे घर सांझ ढले किसके लिए दरवाजा खुला रखते होंगे ? बिना माँ बाप का व्यक्ति अपनी सफलता में किसको पहला फोन करता होगा? रेस में सबसे पीछे आने वाले धावक को कौन शाबासी देता होगा ? रिश्तें जो जिंदगी थे कभी ऐसे जुदा हुए जैसे शाख को विपरीत दिशा में खींचते हुए चीर दिया गया । तन्हा लोग किसके गले लग सिसकते है?
जो अपनों से ठगे जाते है वो लोग सुनवाई के लिए कहाँ जाते है ?
“जिंदगी से बस इतनी शिकायत रही है ।
कटी उनमें जिन्हें हमारी जरूरत नही है।।”
बहुतों के जीवन में दर्द और बेशुमार तन्हाई बिखरी पड़ी है । उन अभागों का साथ देने की कोशिश है मेरी किताब “फिर मिलोगी?” । इसे मिल रहे आप सबके स्नेह का शुक्रिया ।
आपकी मधु
“फिर मिलोगी ?” उपन्यास का अंश
