आंकड़े दे रहे हैं गवाही नतीजों के लिहाज से देखें तो गंभीर और सूर्या की जोड़ी अब तक अपराजेय सी नजर आई है। 39 मैचों में 31 जीत और लगभग 80 प्रतिशत का जीत का रिकॉर्ड यह बताने के लिए काफी है कि इन दोनों की फ्रीक्वेंसी एक ही धुन पर बज रही है। भारतीय क्रिकेट में अक्सर कप्तान को जनरल माना जाता रहा है, जैसा रवि शास्त्री और विराट कोहली के दौर में था। लेकिन टी20 प्रारूप के बदलते मिजाज ने अब ‘फुटबॉल मैनेजर’ शैली की कोचिंग की मांग की है। यहाँ गंभीर एक रणनीतिकार की भूमिका में हैं और सूर्या उस योजना को शत-प्रतिशत मैदान पर उतारने वाले ‘एक्जीक्यूटर’ हैं।
पुराना रिश्ता, नई इबारत इन दोनों का रिश्ता आज का नहीं है। सूर्यकुमार यादव को पहली बार वैश्विक पहचान तब मिली थी जब वे गौतम गंभीर की कप्तानी में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए फिनिशर की भूमिका निभा रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि सूर्या का मशहूर नाम ‘स्काई’ (SKY) भी उन्हें गंभीर ने ही दिया था। यह भारतीय क्रिकेट का एक खुला राज है कि 2024 में हार्दिक पंड्या के ऊपर सूर्यकुमार को टी20 की कप्तानी दिलाने में गंभीर की अहम भूमिका रही थी। गंभीर को पता था कि सूर्या जैसा निडर खिलाड़ी ही उनकी आक्रामक रणनीति को अंजाम दे सकता है।
अलग मिजाज, एक लक्ष्य निजी तौर पर दोनों ध्रुवों की तरह अलग हैं। गंभीर दिल्ली के एक समृद्ध व्यावसायिक परिवार से आते हैं और स्वभाव से बेहद गंभीर और ‘नो-नॉनसेन्स’ खिलाड़ी रहे हैं। वहीं सूर्या मुंबई के मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और मैदान पर बेहद शांत और हंसमुख नजर आते हैं। लेकिन इस सामाजिक-आर्थिक अंतर के बावजूद दोनों का ‘क्रिकेटिंग डीएनए’ एक है। दोनों ही पक्के राष्ट्रवादी हैं और हार न मानने की जिद्द उनके चरित्र का मुख्य हिस्सा है। गंभीर जानते हैं कि उन्हें सहवाग जैसी नैसर्गिक प्रतिभा नहीं मिली थी, इसलिए उन्होंने कड़ी मेहनत से अपनी जगह बनाई। ठीक उसी तरह सूर्या ने भी लंबे समय तक घरेलू क्रिकेट में संघर्ष किया और अपनी जगह छीनी।
अब विश्व कप के महामंच पर गंभीर का गेम प्लान तैयार है और सूर्या को बस अपनी उस आजादी के साथ खेलना है जिसके लिए वे जाने जाते हैं। अगर यह जुगलबंदी अपने पूरे शबाब पर रही, तो भारत को अपना विश्व कप खिताब बचाने से रोकना नामुमकिन होगा।
