
शहरनामा :
जहाँ संवाद समाप्त नहीं होता
कुछ जगहें ऐसी होती हैं
जहाँ बात खत्म हो जाती है,
पर संवाद नहीं।
शब्द थक जाते हैं,
तर्क रुक जाते हैं,
पर संबंध
अब भी बोलते रहते हैं।
यही वह स्थान है
जहाँ संवाद समाप्त नहीं होता।
संवाद का अंत नहीं, रूपांतरण
संवाद का अर्थ
लगातार बोलते रहना नहीं है।
संवाद तब भी चलता है
जब—
कोई जवाब नहीं दिया जाता
कोई सफ़ाई नहीं दी जाती
कोई निर्णय तुरंत नहीं लिया जाता
क्योंकि तब
संवाद शब्दों से निकलकर
उपस्थिति बन जाता है।
गीता इस स्थिति को पहचानती है—
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा?
(गीता 2.54)
स्थितप्रज्ञ
कम बोलता है,
पर उसका मौन
अर्थ से भरा होता है।
घर: जहाँ संवाद रुकता नहीं
घर में संवाद
तब समाप्त नहीं होता
जब बहस खत्म होती है—
वह तब समाप्त होता है
जब सुनना बंद हो जाए।
जहाँ—
माँ की चुप्पी
समझ ली जाती है
पिता की ख़ामोशी
कठोरता नहीं मानी जाती
बच्चे का सन्नाटा
ज़िद नहीं कहलाता
वहाँ संवाद
लगातार बहता रहता है।
मौन और भरोसे का रिश्ता
मौन तब खतरनाक होता है
जब उसमें डर हो।
पर मौन तब पवित्र होता है
जब उसमें भरोसा हो—
“तुम बोलो या न बोलो,
मैं यहाँ हूँ।”
यही वह वाक्य है
जो बोला नहीं जाता,
पर सुना जाता है।
गीता इसी भरोसे पर टिकती है—
योगक्षेमं वहाम्यहम्
(गीता 9.22)
मैं संभाल लूँगा।
पीढ़ियों के बीच का संवाद
संवाद तब भी चलता है
जब दादा‑दादी नहीं रहते,
जब माता‑पिता
कम बोलने लगते हैं।
उनका आचरण,
उनका धैर्य,
उनका मौन—
पीढ़ियों में
संवाद की तरह
बहता रहता है।
भक्ति: जहाँ संवाद कभी खत्म नहीं होता
भक्ति में
प्रश्न कम होते जाते हैं,
पर संबंध गहरा होता जाता है।
वहाँ—
हर उत्तर स्पष्ट नहीं होता
हर दुख का अर्थ नहीं मिलता
हर प्रार्थना पूरी नहीं होती
फिर भी संवाद चलता रहता है।
क्योंकि अब
ईश्वर से बात
शब्दों में नहीं,जी @ै
दासानुदास चेदीराज दास
