दतिया जिले के हंस प्रजापति का मामला सबसे दुखद है। छह वर्षीय हंस को कुत्ते ने काटा था। कमला राजा शासकीय अस्पताल में एंटी-रेबीज वैक्सीन के तीन डोज लगाए जा चुके थे। डॉक्टरों ने चौथा डोज अस्पताल में ही कराने की सलाह दी थी। परिजन बच्चे को घर ले गए और कुछ ही समय बाद उसकी हालत बिगड़ गई। स्कूल से लौटने के बाद उसके मुंह से लार बहने लगी, जो रेबीज का गंभीर लक्षण है। इसके बाद मासूम की मौत हो गई।
पहली मौत 4 फरवरी को दर्ज की गई। ग्वालियर के बगिया इलाके के 48 वर्षीय किरण लालवानी को जनवरी में आवारा कुत्ते ने काटा था। परिजनों के अनुसार स्थानीय क्लीनिक में डॉक्टर ने केवल टिटनेस का इंजेक्शन लगाया और एंटी-रेबीज वैक्सीन देने से मना कर दिया। लगभग एक महीने बाद किरण में रेबीज के क्लासिक लक्षण सामने आए। न्यू जेएएच में भर्ती कराने के दौरान उनकी मौत हो गई। इस मामले में डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही का केस भी दर्ज किया गया।
दूसरी मौत टीकमगढ़ जिले की 65 वर्षीय महिला की हुई, जिसे सियार ने काटा था। समय पर एंटी-रेबीज इलाज न मिलने के कारण संक्रमण तेजी से फैला। गंभीर हालत में महिला को ग्वालियर रेफर किया गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस घटना ने ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और रेफरल सिस्टम की कमजोरी को उजागर किया।
हालिया तीन मौतों ने ग्वालियर में डॉग बाइट मामलों की गंभीरता को सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहर में हर साल हजारों डॉग बाइट केस सामने आते हैं लेकिन स्ट्रीट डॉग कंट्रोल, स्टरलाइजेशन और जन-जागरूकता की रफ्तार धीमी है। रेबीज एक बार फैलने के बाद 100 प्रतिशत घातक है लेकिन समय पर पूरा वैक्सीनेशन लेने से इसे रोका जा सकता है। विशेषज्ञों ने आम जनता को कुत्ते या किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने के बाद घाव को साबुन और पानी से तुरंत धोने अस्पताल पहुंचने और एंटी-रेबीज वैक्सीन का पूरा कोर्स लेने की सलाह दी है। बच्चों को अकेले बाहर न छोड़ने और लापरवाही न करने की चेतावनी भी दी गई है।
मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों और प्रशासन की उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिस्टम और समाज दोनों नहीं सतर्क हुए तो रेबीज और ज्यादा जानें ले सकता है। लोगों में जागरूकता और समय पर इलाज की समझ ही इस जानलेवा बीमारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।
