“श्रीकृष्ण से एक आधुनिक युवा की बातचीत”
युवा :-
हे कृष्ण! आज सब कुछ है—डिग्री, नौकरी, मोबाइल, इंटरनेट।
फिर भी मन अजीब-सा खाली क्यों है?
श्रीकृष्ण (मुस्कराते हुए):
क्योंकि तुमने सुख को संग्रह समझ लिया है,
और सुख वास्तव में अनुभूति है।
गीता 5.22
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते
जो सुख इन्द्रियों से पैदा होते हैं, वे अंततः दुःख के ही कारण बनते हैं।
युवा :
लेकिन प्रभु, हम तो वही कर रहे हैं जो दुनिया कर रही है—
अच्छा पैकेज, ब्रांडेड लाइफ, इंस्टाग्राम पर पहचान।
श्रीकृष्ण :
दुनिया की धारा तेज़ है,
पर हर बहाव मंज़िल तक नहीं ले जाता।
गीता 2.70
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्
जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, फिर भी समुद्र स्थिर रहता है—
वही व्यक्ति शान्त है, जो इच्छाओं के आने-जाने में डगमगाता नहीं।
युवा :
तो क्या सब कुछ छोड़ देना ही समाधान है?
श्रीकृष्ण :
नहीं अर्जुन,
त्याग वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का होना चाहिए।
गीता 3.19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर
आसक्ति छोड़कर अपने कर्तव्य का पालन करो।
आज के शब्दों में—
नौकरी करो, पर पहचान मत बनाओ।
कमाओ, पर खुद को मत बेचो।
युवा :
लेकिन प्रभु, सफलता न मिले तो डर लगता है।
श्रीकृष्ण :
डर इसलिए लगता है क्योंकि तुमने
अपने मूल्य को परिणाम से बाँध दिया है।
गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।
जो युवा यह समझ लेता है,
वह रिज़ल्ट से नहीं टूटता,
और रिज़ल्ट से फूलता भी नहीं।
युवा :
भक्ति को लोग कमजोरों की चीज़ कहते हैं।
श्रीकृष्ण (गंभीर होकर):
भक्ति कमजोरी नहीं,
अहंकार का साहसी विसर्जन है।
गीता 9.22
योगक्षेमं वहाम्यहम्
जो मेरी भक्ति में लगे रहते हैं,
उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
भक्ति का अर्थ है—
“मैं अकेला नहीं हूँ।”
युवा :
तो प्रभु, भक्ति आज के युवा कैसे करे?
श्रीकृष्ण :
दिन की शुरुआत मेरे स्मरण से करो।
निर्णय से पहले अंतरात्मा से पूछो।
सफलता मिले तो विनम्र रहो।
असफलता मिले तो टूटो नहीं।
गीता 6.5
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्
स्वयं अपना उद्धार करो, स्वयं को गिरने मत दो।
युवा (शांत स्वर में):
अब समझ आया प्रभु—
भक्ति जीवन से भागना नहीं,
जीवन को सही दिशा देना है।
श्रीकृष्ण (मधुर मुस्कान के साथ):
और जब दिशा सही होती है,
तो गति अपने-आप सुंदर हो जाती है।
समापन पंक्ति (युवाओं के लिए संदेश)
आज का युवा अगर कृष्ण को
पूजा-कक्ष से निकालकर
जीवन-कक्ष में ले आए—
तो चिंता, अवसाद और भ्रम
तीनों धीरे-धीरे विदा लेने लगेंगे।
दासानुदास चेदीराज दास

