“चौराहे पर खड़े कृष्ण”
आपके भाव के अनुरूप इसे अब पूर्ण मंच–नाटक स्क्रिप्ट के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ—
जिसमें संगीत, बांसुरी, मृदंग, कीर्तन और संवाद एक-दूसरे में घुले हों।
यह स्क्रिप्ट कॉलेज, युवा उत्सव, मंदिर मंच और सभागार—सब जगह मंचन योग्य है।
मंच नाटक (संगीत–कीर्तन सहित)
“चौराहे पर खड़े कृष्ण”
पात्र
श्रीकृष्ण – बंसीधर, सरल, समकालीन भाव में
युवा – आधुनिक शहर का प्रतिनिधि
सूत्रधार – कथा का सूत्र पकड़ने वाला
शहर (कोरस) – 3–4 कलाकार (भीड़/आवाज़)
कीर्तन मंडली – 2–4 कलाकार (मृदंग, करताल, हारमोनियम/बांसुरी)
मंच सज्जा
एक चौराहा (सिग्नल लाइट, पोस्टर, डिजिटल स्क्रीन)
एक ओर छोटा दीपक / तुलसी चौरा
प्रकाश व्यवस्था में शोर → शांति का क्रम
प्रस्तावना (कीर्तन)
(मंद प्रकाश। मृदंग की हल्की थाप। बांसुरी की धीमी तान।)
कीर्तन (समूह, धीमे स्वर में):
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे
(प्रकाश धीरे बढ़ता है।)
दृश्य 1 : शहर का शोर
(तेज़ लाइट। हॉर्न, मोबाइल टोन, नोटिफिकेशन की आवाज़ें।)
शहर (कोरस):
भागो!
आगे बढ़ो!
रुको मत!
पीछे रह गए तो मिट जाओगे!
(युवा मंच पर तेज़ कदमों से चलता है, मोबाइल कान से चिपका हुआ।)
युवा:
हाँ सर…
जी सर…
आज ही भेज देता हूँ…
(रुकता है, थका हुआ)
पता नहीं किससे लड़ रहा हूँ…
दृश्य 2 : कृष्ण का प्रवेश
(शोर अचानक धीमा। बांसुरी की मधुर तान। नीला प्रकाश।)
सूत्रधार:
जहाँ शोर थक जाए,
वहीं कृष्ण प्रकट होते हैं।
(कृष्ण प्रवेश करते हैं।)
कृष्ण (मुस्कराते हुए):
इतनी जल्दी किस बात की है मित्र?
युवा (चौंककर):
आप… यहाँ?
यह जगह तो तनाव के लिए जानी जाती है।
कृष्ण:
मैं वहीं रहता हूँ
जहाँ मन सबसे ज़्यादा भटका होता है।
दृश्य 3 : जीवन का प्रश्न
युवा:
प्रभु, सब कुछ है…
पर भीतर खालीपन क्यों है?
(मृदंग की धीमी थाप)
कृष्ण:
ये हि संस्पर्शजा भोगा
दुःखयोनय एव ते
(गीता 5.22)
जो सुख केवल इन्द्रियों से आता है,
वह टिकता नहीं।
दृश्य 4 : शहर बनाम कृष्ण
(शहर का कोरस फिर उभरता है)
शहर:
कमाओ!
नाम बनाओ!
लाइक बढ़ाओ!
युवा (अस्थिर):
मैं किसकी सुनूँ?
कृष्ण (स्थिर स्वर में):
कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन
(गीता 2.47)
कर्म करो,
पर खुद को मत बेचो।
दृश्य 5 : भक्ति का अर्थ
युवा:
भक्ति मतलब सब छोड़ देना?
कृष्ण (मुस्कान के साथ):
भक्ति मतलब—
सब करते हुए
मुझे याद रखना।
कीर्तन (मध्यम गति)
(मृदंग–करताल तेज़ होते हैं)
कीर्तन मंडली:
मन रे, कृष्ण नाम सुमिर ले
यही जीवन की पूँजी है
(युवा आँख बंद करता है। शांति का भाव।)
दृश्य 6 : भरोसा
युवा:
अगर मैं गिर गया?
कृष्ण (करुण स्वर):
योगक्षेमं वहाम्यहम्
(गीता 9.22)
मैं हूँ।
दृश्य 7 : परिवर्तन
(युवा मोबाइल जेब में रखता है। दीपक के पास आता है।)
युवा:
आज से…
एक कदम आपकी ओर।
कृष्ण:
बस वही पर्याप्त है।
समापन महा-कीर्तन
(पूरा मंच प्रकाश में। सभी पात्र शामिल।)
सभी (उत्साहपूर्वक):
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे
(कीर्तन चरम पर। कृष्ण बांसुरी बजाते हैं।)
अंतिम संवाद (कृष्ण)
कृष्ण:
जब थक जाओ,
तो भागना मत—
मुझे याद कर लेना।
मैं हर चौराहे पर मिलूँगा।
(प्रकाश मंद। पर्दा गिरता है।)
हरे कृष्ण।
शुभ प्रभात..
दासानुदास चेदीराज दास