शून्यकाल के दौरान बोलते हुए चड्ढा ने कहा, “जैसे मतदाता को चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार है, उसी तरह अगर नेता काम नहीं करता तो उसे हटाने का अधिकार भी होना चाहिए। ‘राइट टू रिकॉल’ मतदाताओं को सशक्त बनाएगी और नेताओं को जवाबदेह बनाएगी।”
‘राइट टू रिकॉल’ क्या है?
राघव चड्ढा ने इसे एक ऐसी प्रक्रिया बताया है जिसमें वोटर किसी चुने हुए नेता को उनके कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार रखते हैं। आसान शब्दों में, अगर जनता अपने नेता के काम से संतुष्ट नहीं है, तो वह उसे जल्दी हटाने का विकल्प रख सकती है।
राष्ट्रपति और जज हैं हटाए जा सकते हैं, नेताओं को क्यों नहीं?
चड्ढा ने तर्क दिया कि भारत में पहले ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और न्यायाधीशों के लिए महाभियोग की व्यवस्था है। सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लाया जा सकता है। ऐसे में निर्वाचित नेताओं के लिए भी सुरक्षित और कानूनी प्रक्रिया के जरिए हटाने की सुविधा होना चाहिए।
दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा उपाय
सांसद ने कहा कि ‘राइट टू रिकॉल’ लोकतंत्र को मजबूत करेगा, इसे नेताओं के खिलाफ हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कम से कम 35-40% मतदाताओं के हस्ताक्षर जरूरी हों। नेता को 18 महीने का ‘परफॉर्मेंस पीरियड’ दिया जाए, ताकि वह सुधार कर सके। इस तरह काम करने वाले नेताओं को पार्टी टिकट देंगी और लोकतंत्र मजबूत होगा।
किन देशों में लागू है?
राघव चड्ढा के अनुसार, दुनिया के 20 से अधिक लोकतांत्रिक देशों में यह व्यवस्था मौजूद है। उदाहरण- अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, वेनेज़ुएला, पेरू, इक्वाडोर, जापान, ताइवान। इसके अलावा भारत में यह व्यवस्था कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की ग्राम पंचायतों में लागू है।
