श्रीमद भगवत गीता का जीवित सार है…..
खुली आँखों वाला शहरनामा..
यह विषय पूजा-स्थल का नहीं, चुनाव-स्थल, टीवी स्टूडियो और मंचों का है।
राजनीति : धर्म का बाज़ार
(या जब आस्था ग्राहक बन जाए)
शहर में आजकल धर्म मंदिर में कम
और माइक पर ज़्यादा मिलता है।
सुबह भगवान को फूल चढ़ते हैं,
शाम उन्हीं फूलों से नारे बनाए जाते हैं।
1. धर्म जहाँ मौन था, राजनीति ने शोर पैदा किया
गीता का धर्म भीतर का अनुशासन है।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः
— (गीता 3.35)
पर राजनीति को मौन से डर लगता है।
उसे शोर चाहिए—भीड़ चाहिए—उन्माद चाहिए।
इसलिए उसने धर्म को विचार नहीं, पहचान बना दिया।
अब सवाल यह नहीं— “तुम क्या करते हो?”
सवाल है— “तुम किस ओर हो?”
2. बाज़ार का पहला नियम : डर पैदा करो
धर्म का बाज़ार डर पर चलता है।
“तुम्हारा धर्म खतरे में है”
“तुम्हारी संस्कृति मिटाई जा रही है”
“अगर हम नहीं आए तो सब खत्म हो जाएगा”
गीता इसे सीधा कहती है—
भयाद्रागद्वेषात्
— भय, राग और द्वेष
तीनों अज्ञान की उपज हैं।
पर राजनीति जानती है—
डरा हुआ आदमी सोचता नहीं, चुनता है।
3. भगवान अब सत्य नहीं, ब्रांड हैं
हर पार्टी का एक भगवान है।
हर मंच का एक श्लोक है।
हर भाषण में एक अधूरा संदर्भ है।
गीता का पूरा श्लोक कोई नहीं पढ़ता—
बस उतना हिस्सा,
जितना पोस्टर में फिट हो जाए।
यदा यदा हि धर्मस्य…
पर आगे की पंक्ति भूल जाते हैं—
धर्मसंस्थापनार्थाय…
क्योंकि धर्म की स्थापना
आत्मा में होती है,
राजनीति में नहीं।
4. धर्म बनाम धार्मिकता
धर्म = आत्मसंयम
धार्मिकता = पहचान का शोर
गीता कहती है—
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते
— (गीता 3.4)
धर्म कर्म से सिद्ध होता है,
न कि नारे से।
पर बाज़ार को कर्म नहीं चाहिए,
उसे प्रदर्शन चाहिए।
5. जब साधु प्रचारक बन जाए
आज साधु भी दो किस्म के हैं—
जो आत्मा को जगाते हैं
जो वोटर को
पहले वाले शांति देते हैं,
दूसरे उन्माद।
गीता बहुत साफ कहती है—
त्रैगुण्यविषया वेदा
— (गीता 2.45)
धर्म भी गुणों में फँस सकता है।
और जब फँसता है,
तो सत्ता का उपकरण बन जाता है।
6. भीड़ बनाम भक्त
भीड़ को दिशा चाहिए।
भक्त को सत्य।
भीड़ नाचती है,
भक्त झुकता है।
भीड़ सवाल नहीं पूछती,
भक्त सबसे पहले खुद से पूछता है—
“मैं कौन हूँ?”
गीता की राजनीति नहीं है,
क्योंकि गीता व्यक्ति को बदलती है—
और बदला हुआ व्यक्ति
भीड़ का हिस्सा नहीं रहता।
7. धर्म का बाज़ार क्यों फलता है?
क्योंकि—
आत्मा की मेहनत कठिन है
नारा लगाना आसान है
साधना धीमी है
क्रोध तुरंत असर करता है
गीता चेतावनी देती है—
काम एष क्रोध एष…
— (गीता 3.37)
धर्म का बाज़ार
क्रोध की खेती करता है,
भक्ति विवेक की।
8. कृष्ण की राजनीति क्यों असफल होती?
कल्पना कीजिए—
कृष्ण आज चुनाव लड़ते।
वे कहते—
शत्रु से भी द्वेष मत करो
फल की चिंता छोड़ो
अहंकार त्यागो
भीड़ पूछती— “रैली कब है?”
यही कारण है कि
कृष्ण आज पूजे जाते हैं,
चुने नहीं जाते।
9. निष्कर्ष : धर्म बचाना है तो…
धर्म को राजनीति से नहीं,
भीड़ से बचाना होगा।
गीता आज भी वही कहती है—
श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्
— (गीता 4.39)
श्रद्धा से ज्ञान आता है,
नारे से नहीं।
एक शहरनामा-सा अंतिम वाक्य
धर्म जब सत्ता का सीढ़ी बनता है,
तो भगवान पोस्टर में मुस्कुराते हैं
और इंसान भीतर से सूना हो जाता है।
दासानुदास चेदीराज दास

