क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद इंदिरा ग्रुप ऑफ कंपनियों और इंदिरा IVF हॉस्पिटल के संस्थापक डॉक्टर अजय मुर्डिया की शिकायत से शुरू हुआ। डॉक्टर मुर्डिया का आरोप है कि विक्रम भट्ट और उनके सहयोगियों ने उनकी दिवंगत पत्नी के जीवन पर एक “बायोपिक” बनाने का वादा किया था। इस प्रोजेक्ट के नाम पर भट्ट ने उनसे 30 करोड़ रुपये लिए और यह भरोसा दिलाया कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपये तक की कमाई करेगी। हालांकि, समय बीतने के साथ न तो फिल्म का काम शुरू हुआ और न ही कोई ठोस प्रोजेक्ट सामने आया। डॉक्टर का दावा है कि पैसे लेने के बाद विक्रम भट्ट ने उनका फोन उठाना और संदेशों का जवाब देना पूरी तरह बंद कर दिया था।
कानूनी कार्यवाही और जेल की यात्रा
जब संवाद के सारे रास्ते बंद हो गए, तो डॉक्टर ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया। मामला अदालत तक पहुँचा और उदयपुर की सीजेएम कोर्ट-4 ने विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी को 9 दिसंबर 2025 को सात दिनों की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। रिमांड खत्म होने के बाद, उन्हें उदयपुर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। बीच में खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राजस्थान हाई कोर्ट में जमानत की अर्जी लगाई गई थी, लेकिन अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद भट्ट के वकीलों ने देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और आदेश
पीटीआई (PTI) की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने शुक्रवार को सुनवाई करते हुए विक्रम और श्वेतांबरी को रिहा करने का आदेश पारित किया। कोर्ट ने निचली अदालत (CJM) को जमानत की नियम और शर्तें तय करने का निर्देश दिया है। हालांकि, राहत के साथ-साथ कोर्ट ने इस मामले में राजस्थान सरकार और शिकायतकर्ता डॉक्टर मुर्डिया से जवाब भी तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी के लिए तय की गई है।
मुसीबतें अभी कम नहीं हुई हैं
विक्रम भट्ट के लिए मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। इसी साल जनवरी में एक अन्य बिजनेसमैन ने भी उन पर और उनकी बेटी कृष्णा भट्ट पर 13.5 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। यह नया केस मुंबई के वर्सोवा पुलिस स्टेशन में दर्ज है, जिसकी जांच आर्थिक अपराध शाखा (EOW) कर रही है। ऐसे में, उदयपुर मामले में बेल मिलने के बावजूद, निर्देशक को अन्य कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
