तिब्बत की ‘बफर जोन’ वाली स्थिति का अंत
जनरल चौहान के अनुसारब्रिटिश शासन के जाने के बाद भारत को अपनी सीमाओं का निर्धारण स्वयं करना था। लद्दाख और पूर्वोत्तर मैकमोहन रेखामें स्थिति धुंधली थी। इसी बीचचीन ने 1950 के दशक में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। सीडीएस ने बताया कि उस समय चीन खुद को मजबूत कर रहा था और ल्हासा व शिनजियांग जैसे दूरदराज के क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने के लिए उसे शांति की जरूरत थी। नेहरू को लगा कि पंचशील सिद्धांतों के माध्यम से उत्तरी सीमा का विवाद औपचारिक रूप से सुलझ गया है। इसी समझौते के तहत भारत ने आधिकारिक रूप से तिब्बत पर चीन के संप्रभु अधिकार को स्वीकार कर लियाजिससे सदियों पुराना ‘बफर जोन’ समाप्त होकर एक सक्रिय सीमा में बदल गया।
भारत की ‘दोस्ती’ बनाम चीन की ‘चालाकी’
सीडीएस ने रेखांकित किया कि आजाद भारतचीन को एक मजबूत दोस्त के रूप में देख रहा था और यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र में चीन की स्थायी सीट का समर्थन भी किया। भारत का मानना था कि शिपकी लालिपुलेख और नीति जैसे छह महत्वपूर्ण दर्रों की पहचान व्यापार और तीर्थ यात्रा के लिए होने से सीमा की वैधता तय हो गई है। लेकिन चीन के मंसूबे कुछ और ही थे। चीन ने इसे कभी सीमा समझौता माना ही नहीं; उसके लिए यह केवल तिब्बत के साथ ‘व्यापार और आवागमन’ का एक अस्थाई माध्यम था।
क्या था पंचशील समझौता?
29 अप्रैल 1954 को हुए इस समझौते के पांच मुख्य स्तंभ थे:
एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान।
पारस्परिक अनाक्रमण एक-दूसरे पर हमला न करना)।
आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
समानता और पारस्परिक लाभ।
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
यह समझौता 8 वर्षों के लिए वैध था। जनरल चौहान ने बताया कि भारत को लगा कि इस संधि के बाद उत्तरी सीमा सुरक्षित हैलेकिन 3 जून 1962 को जैसे ही इस समझौते की अवधि समाप्त हुईउसके कुछ ही समय बाद चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। चीन का यह रुख कि यह केवल व्यापारिक समझौता हैसीमा विवाद से इसका लेना-देना नहीं आज भी एलएसी की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।
