
अपने को श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, मानने वाले भाई ,अभिजात्य वर्ग का पोषण करने वाले ,पूजा भजन ध्यान से दूर रहकर भी अपने को पूज्य मनवाने वाले ,भगवान से पूर्व इनकी पूजा को आवश्यक बतलाने वाले आखिर कौन..शहर में एक अजीब-सी धार्मिक कतार लगी है। सबसे आगे वे खड़े हैं—जो अपने को श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, वशिष्ठ मानते हैं; जो कहते हैं, “पहले हमारी मान्यता, फिर भगवान।” पूजा–भजन–ध्यान से दूरी, पर पूज्य बनने की ज़िद ऐसी कि भगवान भी इंतज़ार में रख दिए जाएँ। शहर पूछता है—यह धर्म है या अभिजात्य का लाइसेंस?
ये सज्जन बड़े ठाठ से बताते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए पहले उनकी चरण-रज चाहिए। तर्क बड़ा सीधा है—हम पुराने हैं, बड़े हैं, इसलिए पहले हम। पर क्या सचमुच कृष्ण का रास्ता ऐसा ही है? यदि हाँ, तो भगवान कृष्ण ने युद्धभूमि में अर्जुन से क्या कहा था—पहले किसी कुलीन की आरती उतारो, फिर धर्म पूछो?
श्रीमद्भगवद्गीता कृष्ण का उत्तर साफ़ है—
“मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।” (9.34)
अर्थात्—मन मुझे दो, भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो।
यहाँ “पहले अमुक वर्ग” की कोई शर्त नहीं। कोई वीआईपी पास नहीं।
कृष्ण आगे चेताते हैं—
“अहंकारं बलं दर्पं… आसुरीं योनिमापन्नाः।” (16.4)
अहंकार, दर्प—ये आसुरी गुण हैं।
अब शहर खुद से पूछे—जो खुद को पूज्य मनवाने के लिए भगवान से आगे खड़ा हो, वह किस पाले में है?
इन अभिजात्य-पालकों का एक और खेल है—पूजा से दूर, पर अधिकार से पास। भजन नहीं, पर बंधन; साधना नहीं, पर सत्ता। कृष्ण तो उलटा रास्ता दिखाते हैं—
“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।” (9.26)
एक पत्ता, एक फूल, एक जल—भक्ति हो तो स्वीकार।
यहाँ जाति की मोहर नहीं, हृदय की सच्चाई चलती है।
शहर के मंदिरों में भी यह रोग फैल गया है। गर्भगृह से पहले गर्भ-अहंकार बैठा है—“पहले हमें मानो।” पर कृष्ण ने तो साफ़ कहा—
“नाहं प्रकाशः सर्वस्य… भक्त्या मामभिजानाति।” (7.25; 18.55 का भाव)
मैं सबको नहीं दिखता; मुझे भक्ति से जाना जाता है।
भक्ति—सीढ़ी है; अभिजात्य—दीवार।
इतिहास की फाइलें खोलिए तो यही मिलेगा—जहाँ-जहाँ कुछ लोगों ने खुद को भगवान का दरबान घोषित किया, वहीं से लोग भगवान से दूर हुए। धर्म नहीं टूटा; अहंकार ने धर्म तोड़ा। और जब टूटन आती है, तो शोर सबसे पहले वही मचाते हैं—जो खुद पूजा से दूर रहे।
शहरनामा का निष्कर्ष सीधा है—
कृष्ण के धर्म में पहले कृष्ण, फिर सब।
जो क्रम उलटा करे, वह चाहे जितना संस्कृत बोले—वह धर्म नहीं, अहंकार बेच रहा है।
सावधान रहिए।
जो खुद भजन से भागे और आपको चरणों में बाँधे—उसे पहचानिए।
कृष्ण के यहाँ प्रवेश का पास भक्ति है, वंश नहीं।
— दासानुदास चेदीराज दास
(शहरनामा
