
बात सिर्फ धर्म की नहीं, विश्वास की राजनीति की है।
**भक्ति बनाम वोटर
गुरु बनाम गुरुजी**
(या जब चरणों में श्रद्धा नहीं, भीड़ खड़ी हो)
आज का समय बड़ा अजीब है।
यहाँ भक्त कम हैं, वोटर ज़्यादा।
गुरु कम हैं, गुरुजी हर चौराहे पर।
1. भक्ति क्या चाहती है?
भक्ति कुछ नहीं माँगती।
न पद, न पहचान, न प्रमाणपत्र।
अहैतुकी अप्रतिहता
— भक्ति बिना कारण होती है, बिना शर्त।
भक्ति कहती है—
“मैं बदलूँ।”
2. वोटर क्या चाहता है?
वोटर पूछता है—
“मेरे लिए क्या मिलेगा?”
सुरक्षा
पहचान
बदले का सुख
और थोड़ा सा गौरव
वोटर को भगवान नहीं चाहिए,
उसे अपनी तरफ़ का भगवान चाहिए।
इसलिए आज भक्ति को
घोषणापत्र बना दिया गया है।
3. गुरु कौन होता है?
गुरु अंधकार में खड़ा होकर कहता है—
“देखो, यह अज्ञान है।”
गुरु का काम है—
अहंकार तोड़ना।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
— (गीता 4.34)
गुरु प्रश्न पैदा करता है,
उत्तर नहीं बेचता।
4. गुरुजी कौन होता है?
गुरुजी मंच पर खड़ा होकर कहता है—
“आप सब श्रेष्ठ हैं।”
तालियाँ बजती हैं।
क्योंकि अहंकार को
कभी विरोध नहीं चाहिए।
गुरुजी समाधान देता है—
बिना समस्या समझे।
गुरु बेचैन करता है,
गुरुजी आराम देता है।
5. भक्त बनाम वोटर (असल फर्क)
भक्त
वोटर
भीतर झुकता है
बाहर उँगली उठाता है
दोष खुद में ढूँढता है
दोष हमेशा दूसरे में
कृष्ण को केंद्र मानता है
कृष्ण को प्रतीक
अकेला खड़ा रह सकता है
भीड़ चाहता है
गीता भक्त पैदा करती है,
राजनीति वोटर।
6. जब गुरु वोटर बनाने लगे
सबसे ख़तरनाक क्षण वह होता है
जब गुरु कहे—
“जो मेरे साथ नहीं,
वह धर्म के खिलाफ़ है।”
यहीं गुरु मर जाता है
और गुरुजी जन्म लेता है।
क्योंकि—
विद्या विनयसम्पन्ने
— (गीता 5.18)
विनय बिना विद्या
सिर्फ़ हथियार है।
7. कृष्ण की सबसे बड़ी असुविधा
कृष्ण कभी वोट नहीं माँगते।
वे अर्जुन से भी कहते हैं—
यथेच्छसि तथा कुरु
— (गीता 18.63)
सोचो।
समझो।
फिर निर्णय लो।
आज के गुरुजी कहते—
“बस मेरा नाम लो,
बाकी मैं संभाल लूँगा।”
8. भीड़ को गुरुजी क्यों पसंद हैं?
क्योंकि—
गुरु सवाल देता है
गुरुजी जवाब
गुरु रास्ता दिखाता है
गुरुजी शॉर्टकट
गुरु अकेलापन सिखाता है
गुरुजी झंडा
गीता शॉर्टकट नहीं है।
इसलिए वह वायरल नहीं होती।
9. धर्म का अंतिम पतन
धर्म का पतन तब नहीं होता
जब मंदिर टूटे।
धर्म का पतन तब होता है
जब भक्त वोटर में बदल जाए
और गुरु प्रचारक में।
10. अंतिम सत्य (शहरनामा की भाषा में)
जहाँ गुरु का काम
सत्ता दिलाना हो जाए,
वहाँ भगवान भी
प्रचार सामग्री बन जाते हैं।
और इसलिए—
भक्ति आज भी चुप है,
गंभीर है,
अलोकप्रिय है।
लेकिन वही
मनुष्य को बचाती है।
आख़िरी पंक्ति
भक्त भगवान से डरता नहीं,
वोटर भगवान के नाम से
दूसरों को डराता है।
🌿 दासानुदास चेदीराज दास
