इसी बीच आर्थिक राजधानी इंदौर में नगर निगम के प्रमुख पदों पर फेरबदल की चर्चा जोरों पर है। कुछ समय पहले गंदे पानी के मुद्दे के चलते नगर निगम के कई पदों में बदलाव हुए थे, लेकिन अब नए संकेत मिलने लगे हैं कि बजट सत्र समाप्त होते ही शीर्ष पदों पर नए चेहरों की ताजपोशी की जाएगी। अफसरशाही के इन फेरबदल के पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक समीकरणों का गहरा प्रभाव माना जा रहा है। नगर निगम क्षेत्र में जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी और कर्मचारी इस बदलाव की संभावित दिशा पर निगाह लगाए हुए हैं।
प्रदेश के प्रमुख नगर निगम क्षेत्र में तैनात कार्यपालिक मजिस्ट्रेट भी इन दिनों चर्चाओं में हैं। अफसरशाही में प्रोटोकॉल का पालन हर अधिकारी करता है, लेकिन इस मामले में साहब का अंदाज अलग बताया जा रहा है। अपने पद के प्रभाव को दिखाने के लिए उन्होंने निजी वाहन पर भी बड़े अक्षरों में ‘कार्यपालिक मजिस्ट्रेट’ लिखवाया है। इसके अलावा बच्चों के स्कूल, मेमसाहब की किटी पार्टी या अन्य सामाजिक आयोजनों में भी उनके पद और प्रभाव की झलक दिखाई देती है। प्रशासनिक हलकों में इसे अपने अधिकार और प्रतिष्ठा का प्रदर्शन माना जा रहा है।
वहीं, पदोन्नति के लिए प्रयासरत कलेक्टर भी चर्चा में हैं। आम तौर पर पदोन्नति की चाह रखने वाले अधिकारी नए-नए नवाचार और काम के जरिए अपनी छवि मजबूत करते हैं, लेकिन महाराज के प्रभाव वाले जिले में पदस्थ कलेक्टर अपने काम को सीमित रखते हैं। वे उतना ही काम करते हैं जितना उन्हें स्पष्ट रूप से कहा जाए। माना जा रहा है कि कलेक्टर इस रणनीति के जरिए पदोन्नति के बाद कमिश्नर बनने की राह आसान करना चाहते हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच यह रणनीति अफसरशाही की परंपराओं और महत्वाकांक्षा का एक दिलचस्प उदाहरण है।
कुल मिलाकर महाशिवरात्रि की आध्यात्मिकता और अफसरशाही की रणनीति एक साथ चल रही है। गुप्त पूजा से लेकर नगर निगम में संभावित फेरबदल और पदोन्नति की चाल तक, प्रशासनिक गलियारों में हलचल और उत्सुकता लगातार बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि कौन-सी साधना और कौन-सा रणनीतिक कदम प्रशासनिक समीकरण बदलता है।
