इस मंदिर का निर्माण किसी चमत्कार से कम नहीं है। दक्षिण-द्रविड़ शैलीमें निर्मित इस मंदिर का कार्य वर्ष 1974 में शुरू हुआ था और इसे पूर्ण होने में लगभग 39 सालका लंबा समय लगा। मंदिर की वास्तुकला में तीन पिरामिड नुमा संरचनाएं हैं, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगाती हैं। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित स्फटिक मणि का शिवलिंगश्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। कहा जाता है कि इस पवित्र शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही भक्त के जीवन के सारे कष्ट मिट जाते हैं और उसे नई दिशा प्राप्त होती है।
महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर जटोली मंदिर का सौंदर्य और भी निखर जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, आज ही के दिन महादेव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। वहीं, एक अन्य कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है, जिसमें सृष्टि को बचाने के लिए शिवजी ने हलाहल विषका पान किया था। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने जिस रात जागरण और भक्ति की, वही परंपरा आज महाशिवरात्रिके रूप में मनाई जाती है। जटोली में इस रात का जागरण विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि यहाँ की शांत वादियाँ और शुद्ध वातावरण भक्त को सीधे शिव तत्व से जोड़ देते हैं।
यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल आस्था के वशीभूत होकर ही नहीं आते, बल्कि मंदिर की बेमिसाल नक्काशी और शांत प्राकृतिक परिवेश उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है। जटोली मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा और शिल्पकारों के अथक परिश्रम का प्रतीक है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हजारों की संख्या में पहुँचने वाले श्रद्धालु जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यदि आप भी महादेव के अनन्य भक्त हैं, तो बादलों की गोद में बसे इस दिव्य शिवालय के दर्शन आपके जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव साबित हो सकते हैं।
