तुरंत मोटा रिटर्न नहीं, समय ही असली ताकत
कई नए निवेशक यह मान लेते हैं कि SIP शुरू करते ही उन्हें हर साल ऊंचा और स्थिर रिटर्न मिलेगा। कुछ लोग तो इसे जल्दी अमीर बनने का फॉर्मूला समझ लेते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि SIP कोई जादुई योजना नहीं, बल्कि अनुशासित निवेश की प्रक्रिया है। बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, जिसका असर फंड के प्रदर्शन पर पड़ता है। अगर चुना गया फंड कमजोर है तो नियमित निवेश भी अपेक्षित परिणाम नहीं देगा। आमतौर पर 7 से 15 साल की अवधि में कंपाउंडिंग का असर दिखता है और तब जाकर ठोस ग्रोथ नजर आती है। इसलिए धैर्य और लंबी अवधि की सोच जरूरी है।
ज्यादा फंड मतलब ज्यादा फायदा? जरूरी नहीं
अक्सर निवेशक यह सोचकर कई अलग-अलग म्यूचुअल फंड में SIP शुरू कर देते हैं कि ज्यादा फंड रखने से जोखिम कम होगा और रिटर्न बढ़ेगा। इसी भ्रम में कुछ लोग 8–10 फंड तक जोड़ लेते हैं। लेकिन बहुत अधिक फंड रखने से पोर्टफोलियो जटिल हो जाता है और कई बार एक जैसे सेक्टर या स्टॉक में दोहराव भी हो जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 3 से 5 मजबूत और अलग रणनीति वाले फंड पर्याप्त होते हैं। निवेश लक्ष्य, जोखिम क्षमता और अवधि को ध्यान में रखकर संतुलित पोर्टफोलियो बनाना ज्यादा समझदारी भरा कदम है।
जरूरत पड़े तो SIP रोकना भी समझदारी
एक और आम मिथक यह है कि SIP को कभी बंद नहीं करना चाहिए। जबकि वास्तविकता यह है कि वित्तीय परिस्थितियां बदल सकती हैं। आय में कमी, आपात स्थिति या लक्ष्य में बदलाव आने पर SIP को रोका या बदला जा सकता है। यह कोई कानूनी अनुबंध नहीं है। यदि कोई फंड लगातार खराब प्रदर्शन कर रहा हो, तो बेहतर विकल्प में स्विच करना भी सही फैसला हो सकता है। निवेश में लचीलापन बनाए रखना उतना ही जरूरी है जितना अनुशासन।
