श्रीमद्भागवत सप्तम स्कंध में राजसूय यज्ञ के प्रसंग में नारद मुनि द्वारा कही गई बातें अत्यंत गूढ़, सामाजिक-नैतिक और भक्तिपरक शिक्षा से परिपूर्ण हैं। यह संवाद केवल यज्ञ की औपचारिकता नहीं, बल्कि राजा, समाज और व्यक्ति—तीनों के लिए मार्गदर्शन है।
नीचे उसी का क्रमबद्ध और भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है—
📖 प्रसंग की पृष्ठभूमि
राजा युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। बाह्य रूप से सब कुछ शास्त्रसम्मत, वैभवपूर्ण और सफल प्रतीत हो रहा है।
उसी समय देवर्षि नारद वहाँ आते हैं। नारद जी यज्ञ का विरोध नहीं करते, परंतु यज्ञ के गर्व और सत्ता के मोह से सावधान करते हैं।
नारद मुनि का मूल प्रश्न
नारद जी पूछते हैं—
“राजन्! क्या आपने यह जान लिया है कि कौन वास्तव में ब्राह्मण है, कौन क्षत्रिय, कौन वैश्य और कौन शूद्र..?”
यह प्रश्न वंश या जन्म पर नहीं,
गुण (स्वभाव) और कर्म (आचरण) पर आधारित है।
नारद जी का स्पष्ट सिद्धांत
वर्ण जन्म से नहीं, गुण और कर्म से तय होता है
भागवत का यह क्रांतिकारी कथन नारद जी के माध्यम से आता है—
“यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत्”
(श्रीमद्भागवत 7.11.35)
भावार्थ –
जिसमें ब्राह्मण के गुण दिखें, वही ब्राह्मण है,
चाहे वह किसी भी कुल में जन्मा हो।
नारद जी द्वारा वर्णों की परिभाषा
1. ब्राह्मण कौन?
सत्य, शम, दम, तप
दया, ज्ञान, वैराग्य
ईश्वर भक्ति और अहंकार का अभाव
केवल मंत्र पढ़ लेना ब्राह्मण नहीं बनाता,
जीवन में करुणा और विवेक चाहिए।
2. क्षत्रिय कौन?
प्रजा की रक्षा
अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना
लोभ नहीं, कर्तव्य भावना
राजा वही है जो स्वयं को सेवक माने, स्वामी नहीं।
3. वैश्य कौन?
कृषि, व्यापार, गौ-पालन
समाज के लिए संपत्ति का सदुपयोग
4. शूद्र कौन?
सेवा, परिश्रम, सहयोग
समाज का आधार स्तंभ
नारद जी स्पष्ट कहते हैं—
कोई भी वर्ण नीचा नहीं, नीच है अहंकार और अज्ञान।
राजा के लिए नारद जी की सबसे बड़ी चेतावनी
यज्ञ और सत्ता का गर्व
नारद जी कहते हैं—
“यदि राजा स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि न मानकर ईश्वर समझने लगे,
तो उसका यज्ञ भी बंधन बन जाता है।”
राजसूय यज्ञ आत्मशुद्धि के लिए हो,
न कि—
अहंकार बढ़ाने के लिए
दूसरों को छोटा दिखाने के लिए
भक्ति को सर्वोच्च स्थान
नारद जी अंत में कहते हैं—
“भक्ति के बिना न ज्ञान पूर्ण है,
न कर्म मुक्तिदायक।”
यज्ञ → यदि भक्ति से जुड़ा हो
शासन → यदि भगवान को समर्पित हो
समाज → यदि करुणा से संचालित हो
तभी वह धर्म है।
सार-संदेश (आज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक)
पद नहीं, पात्रता महत्वपूर्ण है
सत्ता नहीं, सेवा धर्म है
जन्म नहीं, आचरण पहचान है
यज्ञ नहीं, भक्ति मुक्तिदायिनी है
दासानुदास चेदीराज दास

