
कृष्ण–गीता केंद्रित वैचारिक लेख के रूप
जहाँ आरोप नहीं, आत्ममंथन है;
और श्रीकृष्ण मार्गदर्शक हैं, गीता विवेक है।
शहरनामा की संवेदनशीलता को बनाए रखते हुए
घर–परिवार–पालक–शिक्षा के प्रश्न को गहरे स्तर पर छूते हुए..
अठारह साल, एक घर और कृष्ण का सवाल
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्धभूमि में एक भी बार यह नहीं पूछा—
“तुम्हारी रैंक क्या है?”
उन्होंने पूछा—
“तुम क्यों मोहग्रस्त हो?”
आज शहरों में हर घर एक छोटा कुरुक्षेत्र है।
अठारह साल तक बच्चा हमारे साथ रहता है—
हमारे खाने की मेज़ पर,
हमारे डर–सपनों के बीच,
हमारे संस्कारों की छाया में।
फिर एक दिन हम कहते हैं—
“अब यह युवा हो गया है,
अब इसे अपना लक्ष्य तय करना चाहिए।”
यह वही क्षण है
जहाँ कृष्ण की गीता
हमसे सवाल करती है—
क्या हमने उसे ‘चुनना’ सिखाया या केवल ‘आज्ञा मानना’?
गीता और लक्ष्य का प्रश्न
श्रीकृष्ण कहते हैं—
गीता 18.63
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु
सब कुछ सोच-विचार कर लो,
फिर जैसा चाहो वैसा निर्णय करो।
यह श्लोक स्वतंत्र चेतना का घोषणा-पत्र है।
पर हमारे घरों में
बच्चे को निर्णय नहीं,
निर्देश दिए जाते हैं।
डॉक्टर बनो
इंजीनियर बनो
“यह सुरक्षित है”
कृष्ण अर्जुन को दिशा देते हैं,
उसकी जगह निर्णय नहीं लेते।
हमने बच्चों को
अठारह साल तक
निर्णय से दूर रखा,
फिर अचानक
निर्णय की अपेक्षा कर ली।
कोचिंग क्यों जरूरी हो गई?
अगर लक्ष्य घर में तय नहीं हुआ,
तो कारण कोचिंग नहीं—
संवाद की अनुपस्थिति है।
गीता कहती है—
गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
कर्म पर अधिकार सिखाया जाता है,
फल पर आसक्ति नहीं।
लेकिन घर में
बच्चे को सिखाया गया—
“फल ही सब कुछ है।”
फिर जब बच्चा
फल के डर से टूटता है,
तो उसे कोचिंग भेज दिया जाता है—
जैसे आत्मविश्वास भी
सिलेबस में मिल जाए।
आत्महत्या : असफलता नहीं, संवाद-विच्छेद
गीता में कृष्ण कहते हैं—
गीता 6.5
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्
मनुष्य स्वयं को उठा भी सकता है
और गिरा भी सकता है।
पर बच्चा यह शक्ति
अकेले नहीं सीखता।
उसे पहले यह विश्वास चाहिए—
“मैं गिरूँगा तो कोई है जो संभालेगा।”
जब घर यह भरोसा नहीं दे पाता,
तो बच्चा हार मान लेता है—
कोचिंग में नहीं,
अपने भीतर।
संस्कार बनाम सुविधा
हमने बच्चों को सुविधा दी—
AC कमरे
स्मार्टफोन
बेहतर स्कूल
पर क्या दिया—
विफल होने का अधिकार?
अपनी रुचि खोजने का समय?
कृष्ण से जुड़ने का आधार?
कृष्ण कहते हैं—
गीता 3.21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः
बच्चे वही सीखते हैं
जो हम जीते हैं।
अगर घर में
केवल चिंता, तुलना और प्रदर्शन है,
तो बच्चा भी
उसी का अनुकरण करेगा।
कृष्ण क्या करते?
कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध से भागने नहीं दिया,
पर उसे युद्ध में अकेला भी नहीं छोड़ा।
यही पालन का सूत्र है—
न दबाव
न उपेक्षा
साथ चलना
अंतिम विचार
अठारह साल
कम समय नहीं होता।
अगर इस समय में
बच्चे का लक्ष्य तैयार नहीं हुआ,
तो शायद
हमने उसे
सुनने का लक्ष्य ही नहीं बनाया।
गीता हमें याद दिलाती है—
मनुष्य जीवन
केवल कुछ बनने के लिए नहीं,
समझने के लिए मिला है।
और जो बच्चा
खुद को समझ ले,
वह रास्ता
खुद बना लेता है।
दासानुदास चेदीराज दास
