मैच की तस्वीर भी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं रही। श्रीलंका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए कठिन पिच पर सात विकेट पर 178 रन बनाए। बीच के ओवरों में जिम्बाब्वे के गेंदबाजों ने रन गति पर लगाम कसी जिससे श्रीलंकाई बल्लेबाज खुलकर नहीं खेल सके। लक्ष्य 179 रन का था दबाव भरा लेकिन असंभव नहीं।
जवाब में जिम्बाब्वे की शुरुआत शानदार रही। पावरप्ले में बिना विकेट खोए 55 रन जुड़ गए। ब्रायन बेनेट और ताडी मारूमानी ने पहले विकेट के लिए 8.3 ओवर में 69 रन जोड़कर मजबूत नींव रखी। मारूमानी 34 रन बनाकर आउट हुए लेकिन बेनेट ने 48 गेंदों में 63 रनों की शानदार अर्धशतकीय पारी खेलकर टीम को मुकाबले में बनाए रखा। रियान बर्ल ने 12 गेंदों में 23 रन की तेज पारी खेली हालांकि वह ज्यादा देर टिक नहीं सके।
इसके बाद कमान संभाली कप्तान सिकंदर रजा ने। जब मैच संतुलन पर था तब रजा ने आक्रामक रुख अपनाया। 26 गेंदों में 45 रन की उनकी नाबाद पारी में 2 चौके और 4 गगनचुंबी छक्के शामिल रहे। 173.08 के स्ट्राइक रेट से खेलते हुए उन्होंने 15वें ओवर में दिलशान मदुशंका को लगातार दो छक्के जड़कर मैच का रुख पलट दिया। अगले ओवर में महीष तीक्षणा पर छक्का और चौका लगाकर दबाव पूरी तरह श्रीलंका पर डाल दिया। 19वें ओवर में रजा आउट हुए लेकिन तब तक जीत लगभग तय हो चुकी थी।
आखिरी ओवर में आठ रन की जरूरत थी और टोनी मुनियोंगा ने तीक्षणा पर छक्का जड़कर जिम्बाब्वे को छह विकेट से ऐतिहासिक जीत दिला दी। टीम ने 19.3 ओवर में चार विकेट पर 182 रन बनाकर लक्ष्य हासिल किया और ग्रुप में अपराजेय रहते हुए सुपर आठ में जगह पक्की कर ली। इससे पहले जिम्बाब्वे ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर भी बड़ा उलटफेर किया था जिससे टूर्नामेंट में उनकी दावेदारी मजबूत हुई है।
रजा की कप्तानी अनुभव और दबाव में खेलने की क्षमता ने एक बार फिर साबित किया कि उम्र महज आंकड़ा है। बड़े मंच पर बड़ा प्रदर्शन ही असली पहचान बनाता है और इस बार सिकंदर रजा ने विश्व क्रिकेट में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा दिया।
