21 जुलाई से 16 अगस्त तक खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट के नए सीजन में निजी निवेश बढ़ने के कारण खिलाड़ियों की सैलरी में उल्लेखनीय इजाफा होने की संभावना है। ऐसे में अगर आईपीएल से जुड़ी फ्रेंचाइजियां पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नजरअंदाज करती हैं तो वे संभावित आर्थिक लाभ से वंचित रह सकते हैं। हालांकि इसे किसी आधिकारिक प्रतिबंध के रूप में घोषित नहीं किया गया है लेकिन मौजूदा भारत-पाक संबंधों की पृष्ठभूमि में इसे रणनीतिक रुख के तौर पर देखा जा रहा है।
ब्रिटिश मीडिया संस्थान BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कथित तौर पर एक खिलाड़ी एजेंट को संकेत दिया कि उसके पाकिस्तानी खिलाड़ियों में रुचि केवल उन्हीं टीमों तक सीमित रह सकती है जिनका आईपीएल से कोई संबंध नहीं है। हालांकि इस मुद्दे पर न तो बोर्ड और न ही किसी फ्रेंचाइजी की ओर से आधिकारिक पुष्टि की गई है जिससे स्थिति अभी अटकलों के दायरे में है।
द हंड्रेड में कुल आठ टीमें हिस्सा लेती हैं और इनमें से कई में आईपीएल से जुड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी है। उदाहरण के तौर पर मैनचेस्टर ओरिजिनल्स ओवल इनविंसिबल्स सदर्न ब्रेव और नॉर्दर्न सुपरचार्जर्स जैसी टीमों में भारतीय निवेशकों की भागीदारी बताई जाती है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि इन टीमों की चयन नीति पर आईपीएल की कारोबारी प्राथमिकताओं और राजनीतिक संवेदनशीलताओं का असर पड़ सकता है।
गौरतलब है कि 2008 के बाद से पाकिस्तानी खिलाड़ी आईपीएल का हिस्सा नहीं रहे हैं। यदि इसी तरह का रुख आईपीएल से जुड़ी विदेशी फ्रेंचाइजियों में भी अपनाया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय टी20 बाजार में पाक खिलाड़ियों के अवसर सीमित हो सकते हैं। एक अन्य एजेंट ने इसे भारतीय निवेश वाली टी20 लीगों में अनलिखा नियम तक करार दिया है हालांकि औपचारिक रूप से ऐसा कोई नियम सार्वजनिक नहीं है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक फ्रेंचाइजी क्रिकेट अब केवल खेल तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह बहु-अरब डॉलर का वैश्विक व्यावसायिक मॉडल बन चुका है। निवेशकों के हित ब्रांड छवि राजनीतिक समीकरण और बाजार रणनीति ये सभी कारक टीम चयन को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि अंतिम तस्वीर नीलामी के दौरान ही साफ होगी लेकिन फिलहाल संकेत यही हैं कि द हंड्रेड के आगामी सत्र में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए राह पहले जितनी सहज नहीं दिख रही।
