इतिहास के पन्नों को पलटें तो सोमनाथ मंदिर पर लगभग छह सदियों तक बार-बार क्रूर हमले हुए। इस श्रृंखला में सबसे विनाशकारी हमला 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने किया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, गजनवी ने न केवल मंदिर की अकूत संपत्ति लूटी, बल्कि पवित्र ज्योतिर्लिंग को भी भारी नुकसान पहुंचाया। हमलों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा; 1299 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के जनरल उलग खान ने हमला कर मूर्ति को दिल्ली ले जाने का दुस्साहस किया। इसके बाद 1395 में जफर खान, 1451 में महमूद बेगड़ा और अंततः 1665 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेशों पर इस आस्था के केंद्र को बार-बार खंडित किया गया। भंसाली की यह फिल्म इन जख्मों और उनसे उबरने की भारतीय जिजीविषा को बड़े पर्दे पर पेश करेगी।
संजय लीला भंसाली का इतिहास से पुराना नाता रहा है। इससे पहले उन्होंने ‘पद्मावत’ के जरिए रानी पद्मावती के त्याग और जौहर की उस शौर्य गाथा को दिखाया था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। खिलजी के उन्माद और राजपूतों की आन-बान-शान को भंसाली ने जिस बारीकी से फिल्माया, वह आज भी मिसाल है। इसके अलावा ‘हीरामंडी’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने यह साबित किया है कि वे बीते हुए कल को वर्तमान में जीवंत करने की अद्भुत कला रखते हैं।
‘जय सोमनाथ’ के जरिए पहली बार भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय और उसके बाद की विजय गाथा सामने आ रही है, जिसे अब तक मुख्यधारा के सिनेमा ने अछूता छोड़ दिया था। केतन मेहता की ऐतिहासिक समझ और भंसाली की भव्य सिनेमैटोग्राफी का मिलन इस फिल्म को दशक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक फिल्म बना सकता है। यह फिल्म न केवल महमूद गजनवी की बर्बरता को उजागर करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि कैसे हर विध्वंस के बाद करोड़ों भारतीयों की आस्था ने सोमनाथ को फिर से संवारा और आज भी वह गौरव के साथ खड़ा है।
