
यह सड़क किसकी है, किसकी का मतलब? भई सरकार कि है, ओर किसकी होगी? ये सड़क ही क्या इस देश के हर नगर-गाँव कि सारी सड़के सरकार की है। फिर सरकार अपनी सड़क का ध्यान क्यों नही रखती ? जिसका भी मन हो जाये वह सड़क पर टेसू जैसा अड़ जाता है, कोई भी नेता आमसभा कर जाता है, टेंट कुर्सिया सजाकर सामाजिक आयोजन, शादी विवाह हो जाते है, साप्ताहिक बाजार, मेले ठेले लग जाते है पर मजाल है सड़क पर 15 दिन महीनों रास्ता बंद कर दिया जाता है ओर आम जनता परेशान हो किन्तु सरकार या उसके नुमाइंदे चूँ तक न बोले, तो सवाल उठेगा ही कि यह सड़क किसकी है? यह अलग बात है कि देश की राजधानी दिल्ली के लोगों के लिए राहत की बात है की उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली की सड़कों-फुटपाथों ओर पार्कों में साप्ताहिक बाजार लगाने की अनुमति किसी भी स्थिति में नहीं देकर सड़कों को अतिक्रमण मुक्त कर रखा है किन्तु दिल्ली जैसे भाग्य अन्य शहरों के नहीं है। दिल्ली कि राजधानी को छोड़ दिया जाए तो हर प्रदेश के संभाग-जिलों की सड़के फुटपाथ पार्क आदि स्थाई अथवा अस्थायी बाजार बन गए, जिन सड़कों से सटे हुये जिन लोगों के घर बने है वे अपने अपने स्कूटर, मोटर सायकल, कार जीप घर के सामने सड़कों पर रखने के अलावा अन्य उपयोगी सामग्री निर्माण सामग्री रेट ईंट गिट्टी आदि सड़कों पर फैलाये इन सड़कों को गली बनाकर सभी के लिए सिरदर्द बने हुये है,किसी की शिकायत या निवेदन पर तत्काल गाली गलौच कर झगड़े पर आमादा रह सड़कों को बपौती मानते है तो कुछेक गरीब की जोरू समझ सड़कों से सभी तरह की छेडछाड़ करने से बाज नहीं आते। इन स्थायी समस्याओं का समाधान वहाँ के नगरनिगम-नगरपालिका, यातायात विभाग, पुलिस प्रशासन सहित जिला कलेक्टर करने मेँ सफल नही हो सके है इसलिए इन सड़कों पर घंटो रेंगते यातायात की कोई सुधि नहीं लेता है ओर सड़के गुपचुप रूप से जुल्म सहने को विवश है।
सालों मेँ कभी कभार किसी नेता, किसी रईस किसी नगरसेठ का सड़कों पर जाम मेँ 10-15 मिनिट फसना हो तो उसकी एयरकंडीशन गाड़ी मेँ भी उसे जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण अराजक यातायात ओर अतिक्रमण जैसी समस्याओं का ध्यान आता है ओर वह जिले के प्रमुख अधिकारियों को पत्र लिखकर अपनी सड़क के दोनों दुकानों पर खड़े वाहनों की पार्किंग आदि का ध्यान दिलाकर बात करे ओर उसे मीडिया अपने समाचार पत्रों मेँ कबरेज देकर छापे तो सड़कों के अतिक्रमण का मामला पूरे जिले के लोगों के कानों मेँ गूंज उठता है। भले उनके विवादों में रहने वाले पत्रों मेँ दूसरी सड़कों का मसला न हो, वही सड़के शामिल हो जो उनके आने जाने के नियमित रूट मेँ हो तो यह सड़कों के साथ नाइंसाफ़ी है। पत्रों से लगता है कि शहर के ये सारे रईसजादों-नगरसेठों के उपयोग की सड़के गरीब-लाबारिस है या सामान्य बोलचाल मेँ कहा जाये तो वे सभी सड़के गरीब-मजबूर की लुगाई की तरह हो गई जिसे सभी अपनी लुगाई मानकर चलते है ओर मौका पाकर सब गरीब को दबाने, सताने के साथ उसकी खिल्ली उड़ाते है, तब की स्थिति में गरीब की पत्नी अपने पति की यह स्थिति देखकर कुछ नहीं बोलती जिसका नाजायज फायदा उठाने वाले लोग उसे भोजाई भाभी बोलकर बुरी नीयत रख उसकी इज्जत को तार- तार करने से बाज नहीं आते। बात यही खत्म नही होती ये सारे रईसजादे ओर तथाकथित सभ्य लोग दोनों समय अपने प्यारे डागी को साफसुथरी सड़कों के बीच में पोटी कराकर कुत्ते के साथ खुद को भी हल्का महसूस कर इस प्रकार घर लौटते है मानो जंग जीत ली जबकि बेचारी सड़कों की विवशता होती है कि वे पैदल चलने वालों के जूते गंदे करे या किसी वाहन के टायर, दोनों स्थिति में सड़क प्रदूषण को रोक नहीं सकती है, जिसे देख आसपास घरों के लोग भी इन सड़कों के बीच में अपने घर का कचरा फेंक अपनी सभ्यता को कलंकित करते है।
गरीब आदमी कम बोलनेवाला सीधा सादा होता है वह सभी को साहब या मालिक बोलता है कोई उसे भईया जी सम्बोधन का मौका नहीं देता है उसके इसी सीधेपन का मज़ाक ओर कम बोलने को दुनिया उसकी कमजोरी समझ लेती है ओर उसका यही मज़ाक उसकी पत्नी पर बिजली बनकर गिरता है जिसे लोग अपनी लुगाई ओर भोजाई समझ कर गरीब के जीवन में तूफान लाकर बुरी तरह प्रभावित करते है पर वह गरीबी के कारण सब सहन कर लेता है। आज यही हालत हमारे शहर ही नहीं अपितु आपके शहर-गाँव की भी है, हर उस गली, नुक्कड़ या चौराहे की सड़क की है जिसका माईबाप उसका नियंता कोई टटपुंजिया नेता या सड़कछाप गुंडा मिल जाएगा, जो सड़क पर कब्जा किए पूरा बाजार अतिक्रमण कर वसूली करके अपनी राजनीति ओर गुंडाइ चला रहा है, मजाल है सरकार के नुमाइंदे पुलिस के अफसर आदि कोई उसे रोकने टोकने की हिम्मत रखता हो।
किसी भी छोटे बड़े बाजार मेँ, किसी पार्क के सामने, व्हीआईपी सड़क को देख लीजिये उसके दोनों ओर सड़क की ओर 6 से 8 फिट अवैध कब्जा ओर दुकान का वोर्ड सड़कों के बीच में लगा मिलेगा। इतना ही नहीं अधिकांश दुकानदार अपनी दुकान के सामने हाथठेला खड़ा कर मासिक वसूली शुरू कर ठेले पर कारोबार करवाने लगा है, जिसमें ग्राहकों की भीड़ सड़क पर ही होती है, यह शहर में जंगलराज है, सड़कों पर जानवर पाले जाते है, जिस सड़क की जो भूमि कीमती ओर उपयोगी हो वहाँ वह मूर्ति रखकर बीच सड़क पर मंदिर बनवा कर आजीवन अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आता, कानूनवाले रोकने आए तो उनकी मुट्ठी गरम होते ही वे अपने दायित्व ओर कर्तव्य को उसी सड़क के गाल पर मल आएंगे जिसे वे भोजाई समझते है। भले सरकार ने हर गली, मोहल्ले, बाजार मेँ विशाल सड़के बनाकर दे दी है किन्तु सड़क के दोनों ओर के दुकानदार उन गरीब सड़कों पर अपनी दुकान के सामने अपनी मर्जी से कब्जा कर सड़क को अवरुद्ध कर सड़क को अपनी लुगाई मानकर कब्जा कर बैठे है किसी की जुर्रत नहीं जो इन्हे टस से मस कर सके। यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सड़कों पर दूकानदारों द्वारा किए गए अतिक्रमण से बचने के लिए कई दुर्घटनाए होती है, लोग अपंग हो जाते है, मौत तक हो जाती है पर सड़क कि इन दुर्दशाओं को भुगतने के लिए आम व्यक्ति ही दोषी ठहराया जाता है, कभी इसे लेकर किसी जिम्मेदार के कान खड़े नही हुए है।
बाज़ारों में दोनों ओर दूकानदारों का सड़क पर कब्जा के बाद सड़क दुबली पतली सिंगल हड्डी कि हो जाती है जिसपर उसे दुहरा दायित्व निभाना पड़ता है जिसमे पहले दायित्व सड़क चालू रहे दोनों ओर के आने जाने वाले वाहनों का मार्ग कि जगह नही रह जाती है किन्तु दूकानदारों पर ग्राहकी भी होती है तब खरीददार दुकान के सामने ही अपना वाहन पार्क करता है तब वह सड़क अपने दुर्भाग्य को कोसती है ओर यातायात चलने कि बजाय रेंगना शुरू हो जा है। अगर साप्ताहिक बाजार हो तो ये सड़क दिखाई ही नहीं देती, दूकानदारों कि दुकानों के सामने उनकी खाली जगह छोड़ आगे कि ओर हाथठेलों पर सब्जी तरकारी के अलावा सड़कों पर अन्य दुकानदार कब्जा कर लेता है बेचारी सड़के जाम हो जाती है। भीड़ में दूकानदारों के लोडिंग टृक घंटों सड़कों पर होते है जनता 100 कदम कि सड़क को आधे घंटे में पार करने को विवश होती है। इन सड़कों पर चलने वालों का जीवन एक त्रासदी से कम नही होता, उनकी कठिनाइयो ओर सड़कों के घंटों जाम होने के बाद मजाल है जिला प्रशासन, यातायात आदि कोई सड़क को अतिक्रमण करने वाले उसके नाजायज ख़समों से मुक्त करने का साहस करे, सब के सब नपुसंक बने होते है ओर सड़क के तन वदन पर इनकी मनमानी चलती रहती है ओर वह खामोशी से सब सहती रहती है जनता अपने अकर्मण्य होने को भुगतती है। सरकार ओर उसका पूरा तंत्र सड़क की व्यथा सुनने को तैयार नहीं है, सड़कों की छाती पर दाल गलाने वाले जिला प्रशासन को अपनी मुट्ठी में लिए होते है, वे किसी भी सड़क के दिल में छेद करे, उसे अपने फायदे के लिए सजाये सवारे या सड़क पर थूके, उन्हे पूरी छुट है आजादी के बाद अकेली सड़क है जिससे सभी भाभी का रिश्ता रखकर उसकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने से वाज नहीं आते
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्य प्रदेश मोबाइल 9993376616
