
शहरनामा :- में आज
सनातन—पूजा नहीं, जागृति..
शहर में आजकल पूजा का ट्रैफिक बहुत है।
सुबह मंदिर, शाम आरती, रात प्रवचन—
पर सवाल यह है कि
इतनी पूजा के बाद भी हम जागे क्यों नहीं?
घंटी बजती है,
पर चेतना नहीं।
धूप जलती है,
पर अज्ञान नहीं जलता।
और हम खुश हो जाते हैं यह सोचकर कि
“आज भगवान मान गए।”
शहरनामा यहाँ थोड़ा रुकता है—
क्योंकि सनातन धर्म भगवान को मनाने का नहीं,
खुद को जगाने का विज्ञान है।
उपनिषद ने बहुत पहले,
बिना लाउडस्पीकर के,
सीधे-सीधे कहा था—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
— कठोपनिषद
मतलब—
उठो, जागो, और सत्य को जानो।
ध्यान दीजिए,
यहाँ कहीं नहीं लिखा—
“फूल चढ़ाओ, प्रसाद बढ़ाओ।”
यहाँ लिखा है—जागो।
शहर में पूजा अक्सर सौदे जैसी होती है—
नारियल मैं दूँगा,
मनोकामना तुम पूरी करना।
अगर काम हो गया,
तो अगली अमावस्या भी पक्की।
लेकिन कृष्ण ने इस लेन-देन को
बहुत शांति से उलट दिया—
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
— भगवद्गीता 9.26
यहाँ फूल की बात कम है,
भक्त्या की बात ज़्यादा है।
यानी—
पूजा वस्तु नहीं,
चेतना की अवस्था है।
शहरनामा पूछता है—
अगर पूजा के बाद भी
डर जस का तस है,
क्रोध वहीं है,
अहंकार और मोटा हो गया—
तो हमने क्या किया?
उपनिषद जवाब देता है—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
— कठोपनिषद 1.2.23
मतलब—
आत्मा भाषणों से नहीं मिलती,
ज्ञान के ढेर से नहीं मिलती,
वह अनुभव से जानी जाती है।
यानी—
पूजा सुनने से नहीं,
जीने से पूरी होती है।
सनातन इसलिए
सिर्फ़ मंदिर का पता नहीं देता,
वह जीवन का रास्ता देता है।
कृष्ण ने इसे एक पंक्ति में निपटा दिया—
योगः कर्मसु कौशलम् ।
— भगवद्गीता 2.50
अर्थात—
हर काम को होश में करना ही योग है।
शहरनामा की भाषा में—
ऑफिस में ईमानदारी,
घर में करुणा,
रास्ते में संयम—
यही असली पूजा है।
इसलिए सनातन में
मूर्ति अंतिम सत्य नहीं,
स्मरण है।
मंत्र जादू नहीं,
जागने की पुकार है।
और पूजा—
एक शुरुआत है,
मंज़िल नहीं।
शहरनामा का निष्कर्ष
सनातन धर्म में
पूजा दीया है,
पर जागृति उसकी लौ है।
और जिस दिन लौ जल गई,
उस दिन मंदिर बाहर नहीं—
भीतर बन जाता है।
शुभ रात्रि
हरे कृष्ण..
दासानुदास चेदीराज दास
