वीर सावरकर पर हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में कई फिल्में बनाई गई हैं। इनमें क्षेत्रीय सिनेमा की विशेषता और स्थानीय प्रभाव भी देखने को मिलता है। सबसे पहले रणदीप हुड्डा की फिल्म स्वातंत्र्य वीर सावरकर का नाम आता है। इस फिल्म के लिए रणदीप ने अपनी पूरी मेहनत के साथ-साथ घर तक बेच दिया था। उन्होंने सावरकर का किरदार निभाया और उसमें जीवन का हर भाव भर दिया। फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन औसत रहा, लेकिन सावरकर के संघर्ष और देशभक्ति की भावना को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया।
इसके बाद प्रियदर्शन की कालापानी भी शुरुआती फिल्मों में शामिल है, जिसमें स्वतंत्रता सेनानी और उनके संघर्ष का उल्लेख है। यह फिल्म उन क्रांतिकारियों की कहानी दिखाती है जिन्हें ब्रिटिश राज ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कैद किया था। फिल्म में अनु कपूर ने सावरकर का किरदार निभाया। 1996 में रिलीज हुई यह फिल्म अपने समय की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है और दर्शकों को इतिहास की कठोर सच्चाई से अवगत कराती है।
साल 2001 में आई फिल्म वीर सावरकर भी यादगार रही। इसके गुजराती संस्करण को भी दर्शकों ने खूब सराहा। फिल्म का निर्माण Sudhir Phadke ने सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान के तहत किया, जबकि शैलेंद्र गौर ने सावरकर का किरदार निभाया। निर्देशन Ved Rahi ने किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार फिल्म के निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा किया गया था और लोगों को सावरकर के साहस और प्रयासों से जागरूक किया गया।
2015 में रिलीज हुई मराठी फिल्म व्हाट अबाउट सावरकर? भी खास नजर आई। यह फिल्म सीधे सावरकर की जीवनी पर आधारित नहीं थी, लेकिन उनके सम्मान और देशभक्ति की जंग को प्रभावशाली ढंग से पेश करती है। फिल्म में अभिमान मराठे की कहानी दिखाई गई है, जो वीर सावरकर का अपमान करने वाले भ्रष्ट मंत्री के खिलाफ आवाज उठाता है। संघर्ष में उसके मित्र भी उसका साथ देते हैं। इस तरह फिल्म सावरकर को सम्मान दिलाने की जंग को दर्शाती है और युवाओं में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाती है।
ये फिल्में सिर्फ सिनेमा की कृतियाँ नहीं हैं। ये स्वतंत्रता संग्राम, वीर सावरकर की प्रेरक जीवन-गाथा और देशभक्ति की मिसाल पेश करती हैं। उनके संघर्ष, त्याग और साहस को दर्शाती ये फिल्में आज भी प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी को प्रेरित करती हैं और हमें यह याद दिलाती हैं कि देश के लिए समर्पण और वीरता का मतलब क्या होता है।
