
शहरनामा में आज
कर्म पर विराम—कब लगेगा..?
शहर की भीड़ में चलते-चलते एक सवाल बार-बार कान पकड़कर खड़ा हो जाता है—
“कर्म पर विराम कब लगता है?”
न नौकरी रुकती है, न दौड़ रुकती है, न उम्मीदें थमती हैं।
और मज़े की बात, मनुष्य सोचता है कि वह जो कर रहा है—कर्म है।
जबकि गीता धीरे से कान में फुसफुसाती है—
“कर्म तब तक कर्म नहीं, जब तक उसके पीछे ‘मैं’ बैठा है।”
हमारे यहाँ कर्म का अर्थ भी तिरछा हो गया है।
दफ्तर का कर्म, राजनीति का कर्म, टेंडरों का कर्म, रिश्वत का कर्म, फोटो खिंचवाने का कर्म—
सब कर्म हैं, पर भगवद्गीता के कर्म से कोसों दूर।
गीता कहती है—
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
जब तक कर्म भगवान के लिए नहीं, तब तक वह बंधन है।
अब शहर का आदमी पूछता है—
“तो फिर कर्म पर विराम कब?”
उत्तर बड़ा सीधा है, पर सुनने में कठिन—
“जब कर्ता बदल जाए।”
जिस दिन कर्म करने वाला मनुष्य नहीं,
मनुष्य के भीतर बैठा भगवान का सेवाभाव “कर्ता” बन जाए—
उसी दिन कर्म का हिसाब बंद हो जाता है।
कर्म चलता रहता है, पर बंधन का लॉग-इन लॉग-आउट हो जाता है।
यह वही दिन है,
जब मनुष्य कह देता है—
“हे प्रभु, जो भी करूँ, आपके लिए करूँ।
फल आपका, ज़िम्मा आपका, मैं सिर्फ माध्यम।”
यही गीता का निष्काम कर्म है।
और यही कर्म पर विराम।
पर हमारे शहरों में विराम किसको चाहिए?
यहाँ तो लोग ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे भगवान के ऑफिस में देर हो रही हो।
फल की चिंता ऐसी कि सारा शहर फल-सलाद बन गया है।
कर्मफल की भूख ऐसी कि रिश्वत से लेकर जुगाड़ तक सब खाया जा रहा है।
और ऊपर से दावा—“हम कर्मयोगी हैं।”
कर्मयोगी तब बनते हैं
जब कर्म अर्पण हो,
अहंकार तर्पण हो,
और फल-लोलुपता विसर्जन।
गीता 18.46 कहती है—
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः
जब मनुष्य अपने कर्म को भगवान की पूजा बना देता है, तभी उसे सिद्धि मिलती है।
शहर की भाषा में कहूँ तो—
सरकारी फाइल भी यदि भगवान को अर्पित होकर चले,
तो आधे भ्रष्टाचार की छुट्टी हो जाए।
फिर विराम वहाँ लगेगा जहाँ आज अफरातफ़री लगी है।
लेकिन समाज तब बदलेगा
जब इंसान का ‘मैं’ बदलेगा।
क्योंकि गीता का नियम साफ़ है—
कर्म बदले या न बदले,
कर्म का कर्ता बदलते ही
बंधन समाप्त हो जाता है।
और जिस दिन यह समझ आ जाए,
उसी दिन जीवन का सबसे बड़ा “विराम” लगता है—
पाप-पुण्य के हिसाब पर विराम,
अहंकार की डायरी पर विराम,
मोह की मुहर पर विराम।
कर्म तो चलता रहेगा—
पर वह सेवा बन जाएगा।
और सेवा में गणित नहीं चलता।
शुभ प्रभात
हरे कृष्ण
दासानुदास चेदीराज दास
