2014 से चल रहा शोध
संस्थान के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इस बारे में पोस्ट भी किया गया है। इसके मुताबिक यह इनोवेशन दशकों के रिसर्च का परिणाम है। यह रिसर्च साल 2014 में, केमिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में शुरू हुई थी। महाजनी ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि तब आईआईटी बॉम्बे के हरे-भरे मैदान में काफी ज्यादा सूखी पत्तियां गिरी रहती थीं। इन पत्तियों को डिस्पोज करना एक बड़ा टास्क हुआ करता था। इन सूखी पत्तियों को ठिकाने लगाने का रास्ता ढूंढते-ढूंढते हम गैसिफायर तक पहुंच गए।
आसान नहीं था सफर
इस पोस्ट में आगे बताया गया है कि यह यात्रा इतनी आसान नहीं है। शुरुआती ट्रायल्स में काफी ज्यादा धुआं हो रहा था। इसके चलते किचन स्टाफ को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। इसके मुताबिक एक बड़ी बाधा, क्लिंकर बनाने की थी। ठोस अवशेष के चलते ट्रैडिशन सिस्टम जाम हो जाते थे। इन असंतुलनों के बावजूद, टीम ने टेक्नोलॉजी पर काम करना जारी रखा। 2016 तक, उन्होंने एक पेटेंट प्राप्त गैसीफायर विकसित कर लिया। इसके बाद चीजें काफी आसान हो गईं।
अब सफलतापूर्वक लागू
साल 2017 में, ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संदीप कुमार इस प्रोजेक्ट में शामिल हुए और एक बेहतर बर्नर डिजाइन पर काम किया। संस्थान की लिविंग लैब पहल ने कैंपस में टेस्टिंग की अनुमति दी। इससे टीम को सुरक्षा संबंधी चिंताओं को सही करने और यूजर्स के बीच भरोसे को फिर से स्थापित करने में मदद मिली। निरंतर परीक्षण और सुधार के एक साल के बाद और आगे कुछ काम के बाद, 2024 तक यह सिस्टम स्टाफ कैंटीन में सफलतापूर्वक लागू कर दिया गया।
अब मेस में भी लगाने का प्लान
आज आलम यह है कि कैंटीन में एलपीजी का इस्तेमाल 30 से 40 फीसदी तक कम हो चुका है। इसकी थर्मल एफिशिएंसी 60 फीसदी तक है और उत्सर्जन बहुत कम होता है। इस तकनीक ने न केवल ईंधन की लागत घटाई है बल्कि यह सुनिश्चित भी किया है कि अगर एलपीजी की आपूर्ति बाधित हो जाए, तो खाना पकाने का काम सहज रूप से जारी रह सके। इस सिस्टम से सालाना करीब आठ टन कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होता है। पोस्ट में कहा गया है कि हॉस्टल की मेस में बड़ी यूनिट लगाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे एलपीजी की खपत में काफी कमी आ सकती है। इससे सालाना 50 लाख तक की बचत हो सकती है।
